आजा कब से पुकारूं तेरा नाम रे
आजा कब से पुकारूं तेरा नाम रे
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे,
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मथुरा में ढूंढा, मैंने गोकुल में ढूंढा,
उज्जैन जाकर तुझे, गुरुकुल में ढूंढा।
खोजत-खोजत वर्ष बीत गए,
फिर भी ना आया काम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
सांवली सूरत को तरसे हैं अंखियां,
काटे कटे ना मेरी वैरन ये रतियां।
कोई तो जाए, जो तुझको सुनाए,
मेरा ये पैग़ाम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
सूना है आंगन, है सूना ज़माना,
हर दर फिरे है तेरा पागल दीवाना।
टूट गया हूं, हार गया हूं,
कोशिश कर ली तमाम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
गमगीन आलम है उजड़े चमन में,
दर्शन की चाहत लगी मेरे मन में।
छाई उदासी, रूप-गिरी के,
दिल में आठों याम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मथुरा में ढूंढा, मैंने गोकुल में ढूंढा,
उज्जैन जाकर तुझे, गुरुकुल में ढूंढा।
खोजत-खोजत वर्ष बीत गए,
फिर भी ना आया काम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
सांवली सूरत को तरसे हैं अंखियां,
काटे कटे ना मेरी वैरन ये रतियां।
कोई तो जाए, जो तुझको सुनाए,
मेरा ये पैग़ाम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
सूना है आंगन, है सूना ज़माना,
हर दर फिरे है तेरा पागल दीवाना।
टूट गया हूं, हार गया हूं,
कोशिश कर ली तमाम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
गमगीन आलम है उजड़े चमन में,
दर्शन की चाहत लगी मेरे मन में।
छाई उदासी, रूप-गिरी के,
दिल में आठों याम रे…
आजा, कब से पुकारूं तेरा नाम रे॥
मेरे कृष्णा, मेरे श्याम रे॥
मेरे कृष्णा मेरे शयाम रे आजा कब से पुकारू तेरा नाम रे वेदाचार्य रूपगिरी जी महाराज भरतपुर
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प्रेम और विरह की गहराई में डूबा मन, अपने प्रिय के लिए तड़प रहा है। हर दिशा में तलाश, हर जगह खोज, लेकिन कहीं भी संतोष नहीं मिलता। आँखों में बस एक ही छवि बसी है, जिसकी झलक पाने को दिल बेचैन है। रातें जागते हुए कटती हैं, हर क्षण इंतजार और पुकार से भरा है। जीवन का हर कोना सूना है, हर रंग फीका पड़ गया है, और मन की व्याकुलता किसी भी सान्त्वना से कम नहीं होती।
हर कोशिश के बाद भी जब प्रिय का मिलन नहीं होता, तो मन टूट जाता है, लेकिन आशा और पुकार फिर भी नहीं रुकती। वातावरण में उदासी छा जाती है, लेकिन भीतर दर्शन की चाह और भी प्रबल हो जाती है। हर सांस, हर धड़कन में बस उसी प्रिय का नाम गूंजता है, और यही तड़प प्रेम को और भी पवित्र, और भी गहरा बना देती है।
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श्रृंगार तेरा देखा तो तुझ में खो गया हूँ
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हर कोशिश के बाद भी जब प्रिय का मिलन नहीं होता, तो मन टूट जाता है, लेकिन आशा और पुकार फिर भी नहीं रुकती। वातावरण में उदासी छा जाती है, लेकिन भीतर दर्शन की चाह और भी प्रबल हो जाती है। हर सांस, हर धड़कन में बस उसी प्रिय का नाम गूंजता है, और यही तड़प प्रेम को और भी पवित्र, और भी गहरा बना देती है।
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Author - Saroj Jangir
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