काया नही रे सुहाणी भजन बिन

काया नही रे सुहाणी भजन बिन

काया नहीं रे सुहाणी भजन बिन,
बिना लूण (नमक) की दाल, आलोणी भजन बिन।।

गर्भवास म्हारी, भक्ति क भूली न,
बाहर हुई न भूलाणी,
मोह-माया में नर लिपट गयो,
सोयो तो भूमि बिराणी भजन बिन।।

हाड़-मास को बनियो रे पिंजरो,
ऊपर चम लिपटाणी,
हाथ, पांव, मुख, मस्तक धरियां,
आन उत्तम दीरे निसाणी भजन बिन।।

भाई, बंधु और कुंटुंब-कबीला,
इनका ही सच्चा जाय,
राम नाम की कदर नी जाणी,
बैठे जेठ-जैठाणी भजन बिन।।

लख चौरासी भटकी न आयो,
याही में भूल-भूलाणी,
कहे गरु सिंगा, सुनो भाई साधू,
थारी काल-करग धूल-धाणी भजन बिन।।


श्री संत सिंगाजी भजन काया नहीं रे सुहानी भजन बिन

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श्री संत सिंगाजी भजन मंडली पीथमपुर महू

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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