सम्पूर्ण मण्डल शशांक कला कलाप शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लंग्घयंति । ये संश्रितास्त्रिजगदीश्वर नाथमेकं, कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम ॥14॥ राजसम्मान सौभाग्यवर्धक
चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभि नीतं मनागपि मनो न विकार मार्गम् । कल्पांत काल मरुता चलिता चलेन किं मन्दराद्रि शिखरं चलितं कदाचित् ॥15॥ सर्व विजय दायक
को विस्मयोत्र यदि नाम गुणैरशेषै, स्त्वं संश्रितो निरवकाश तया मुनीश । दोषै रुपात्त विविधाश्रय जात गर्वैः, स्वप्नांतरेपि न कदाचिद पीक्षितोसि ॥27।। सर्व कार्य सिद्धि दायक
आचार्य मानतुंगजी के द्वारा भक्तामर स्तोत्र की रचना की गयी थी। इसकी भाषा संस्कृत में है और इसके प्रथम शब्द भक्तामर के कारन ही इसका नाम ‘भक्तामर स्तोत्र’ पड़ गया तथा इसको वसन तिलिका छंद में लिखा गया है। इसमें कुल ४८ श्लोक हैं। इसका जैन धर्म में बहुत महत्त्व है तथा सभी जैन परम्पराओं में प्रमुख स्थान रखता है। इसकी उत्पत्ति के बारे में मान्यता है की एक बार राजा भोज ने आचार मानतुंगजी को जेल में डाल दिया उस जेल के कुल ४८ ताले थे और मानतुंगजी जी ने यही पर यह स्त्रोत लिखा। जैसे जैसे उन्होंने यह स्त्रोत लिखा वैसे वैसे पुरे ४८ ताले टूटते गए। मानतुंगजी का प्रादुर्भाव राजा भोज के समय में ही है। मंत्र शक्ति में आस्था रखने वाले लोगों के लिए यह एक दिव्य मंत्र है जिसका प्रभाव चमत्कारिक माना जाता है। इस स्त्रोत के नियमित पाठ करने से कैंसर जैसे असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं और व्यक्ति को अद्भुत मानसिक शान्ति का अनुभव होने लगता है। व्यक्ति की दरिद्रता दूर होती है और सुख सम्पदा और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सच्चे मन से इसका पाठ करने से ईश्वर से साक्षत्कार प्राप्त होता है।
इस स्त्रोत के पाठ के लिए सूर्योदय का समय सर्वोत्तम होता है। इस स्त्रोत के शब्दों का चयन चमत्कारिक है और उच्चारण से आस पास के वातावरण में अद्भुद सा परमाणु प्रभाव का वातावरण बनता है जो की एक अनूठी बात है।इस स्तोत्र का पाठ लयबद्ध-मधुर-मंजुल एवं समूह स्वर में सुबह के समय यदि किया जाए तो ज्यादा प्रभावप्रद बनता है।
भक्तामर स्तोत्र क्या है ?
भक्तामर स्तोत्र का जैन धर्म की एक महत्वपूर्ण स्तुति है। भक्तामर स्तोत्र के लेखक आचार्य मानतुंग जी हैं। यह संस्कृत भाषा की एक प्रार्थना है।
भक्तामर स्तोत्र के रचनाकार/लेखक कौन हैं ?
भक्तामर स्तोत्र के लेखक आचार्य मानतुंग जी हैं।
भक्तामर स्तोत्र के लिखने की कहानी क्या है ?
आचार्य मानतुंग जी को राजा भोज ने जेल में भेज दिया था। जेल अत्यंत ही मजबूत थी जिसके ४८ दरवाजे और ४८ ही ताले लगे हुए थे। आचार्य मानतुंग जी ने उस जेल में ही भक्तामर स्तोत्र की रचना की और हरेक पद की रचना में एक ताला टूटता चला गया और ४८ पदों के पूर्ण होने पर पूरे 48 ताले स्वतः ही टूट गए।
भक्तामर स्तोत्र के वाचन / जप से क्या लाभ होते हैं ?
भक्तामर स्तोत्र के वाचन / जप से मानसिक शान्ति का अनुभव होता है। शक्ति की आस्था का यह एक दिव्य मन्त्र है। साथ ही इसके वाचन से वैभव और सम्पदा का भी विकास होता है। इस मन्त्र की मान्यता इतनी अधिक है की यदि व्यक्ति शुद्ध मन से इस मन्त्र का जाप करे तो उसे इश्वर के दर्शन भी होते हैं।
भक्तामर स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?
भक्तामर स्तोत्र का पाठ शारीरिक और मानसिक शुद्धता के साथ किया जाना आवश्यक है। भक्तामर स्तोत्र का पाठ सूर्योदय का समय सबसे अधिक श्रेष्ठ माना गया है। नियमित रूप से इसके पाठ के लिए श्रावण, भादवा, कार्तिक, पौष, अगहन या माघ में इसका पाठ लाभकारी होता है। उल्लेखनीय है की तिथि पूर्णा, नंदा और जया हो, रिक्ता न हो, इसका विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।
भक्तामर स्तोत्र का अर्थ क्या है?
भक्तमार स्तोत्र एक जैन संस्कृत में लिखित एक प्रार्थना है। इसकी रचना आचार्य मनतुंगा के द्वारा की गई थी जो भोज राजा के समकालीन थे। भक्तमार नाम दो संस्कृत नामों, "भक्त" (भक्त) और "अमर" (अमर) के से बना है।
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भक्तमाल स्तोत्र जैन समुदाय में सबसे प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसमें 48 छंद हैं और यह सातवीं शताब्दी ईस्वी में आचार्य मानतुंगा द्वारा संस्कृत में लिखा गया था। श्री भक्तमाल स्तोत्र में 24 तीर्थंकरों, 12 चक्रवर्ती, नौ बलदेव, नौ नारायण, और 24 शलाका पुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। ये सभी जैन धर्म के महान संत और तपस्वी थे।
श्री भक्तमाल स्तोत्र जैन धर्म की संस्कृति और दर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्तोत्र जैन भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। श्री भक्तमाल स्तोत्र जैन धर्म में सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण स्तोत्रों में से एक है। यह स्तोत्र जैन भक्तों को उनके आध्यात्मिक मार्ग पर मार्गदर्शन प्रदान करता है और उन्हें मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है।
आचार्य मानतुंगा एक दिगंबर जैन आचार्य और विद्वान थे, जो 7वीं शताब्दी ईस्वी में मालवा क्षेत्र में रहते थे। वे जैन धर्म के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित आचार्यों में से एक हैं। आचार्य मानतुंगा ने कई महत्वपूर्ण जैन ग्रंथों की रचना की, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध श्री भक्तमाल स्तोत्र है। श्री भक्तमाल स्तोत्र जैन धर्म में सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण स्तोत्रों में से एक है। यह स्तोत्र जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों, 12 चक्रवर्ती, नौ बलदेव, नौ नारायण, और 24 शलाका पुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। ये सभी जैन धर्म के महान संत और तपस्वी थे। आचार्य मानतुंगा ने श्री भक्तमाल स्तोत्र के अलावा भी कई अन्य महत्वपूर्ण जैन ग्रंथों की रचना की, जैसे कि:
व्यक्तिकार
आत्मध्याना
उपासकदशा
पंचस्तिकायसारा
धार्मसारसमुच्चय
आचार्य मानतुंगा के ग्रंथों ने जैन धर्म के दर्शन और संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके ग्रंथ आज भी जैन भक्तों द्वारा व्यापक रूप से पढ़े और अध्ययन किए जाते हैं। आचार्य मानतुंगा जैन धर्म के एक महान आचार्य और विद्वान थे। उनके ग्रंथों ने जैन धर्म के दर्शन और संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वे जैन धर्म के सबसे सम्मानित और श्रद्धेय आचार्यों में से एक हैं। आपको ये पोस्ट पसंद आ सकती हैं