हरिजूको ग्वालिन भोजन लाई भजन
हरिजूको ग्वालिन भोजन लाई भजन
हरिजूको ग्वालिन भोजन लाई ।
वृंदा विपिन, विशद यमुनातट, सुन ज्यों नार बनाई ॥ १ ॥
सानसान दधिभात लियो है, सुखद सदन के हेत ।
मध्य गोपाल, मंडली मोहन, छाक विहंसी मुख देत ॥ २ ॥
देवलोक देखत सब कौतुक, बालकेलि अनुरागे ।
गावत सुनत, सुखद अतिमानो, सुर दुरत दुःख भागे ॥ ३ ॥
वृंदा विपिन, विशद यमुनातट, सुन ज्यों नार बनाई ॥ १ ॥
सानसान दधिभात लियो है, सुखद सदन के हेत ।
मध्य गोपाल, मंडली मोहन, छाक विहंसी मुख देत ॥ २ ॥
देवलोक देखत सब कौतुक, बालकेलि अनुरागे ।
गावत सुनत, सुखद अतिमानो, सुर दुरत दुःख भागे ॥ ३ ॥
हरि जू को ग्वालिन भोजन लाई | Hari Ju Ko Gvaalin Bhojan Laayi | श्री सूरदास जी पद | Shri Indresh Ji
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जब राम अवध में पधारते हैं, तो हर घर का आंगन जैसे फूलों से भर जाता है। भाग्य जागते हैं, पुराने पुण्य फलते हैं, और हर तरफ़ खुशी की लहर दौड़ जाती है। जन-जन के राजदुलारे आ गए हैं, तो अब आँगन बुहारने का मन करता है। लल्ला की राह निहारते हुए इंतज़ार है कि वो आएँगे, मेरे आँगन में खेलेंगे, और मैं उनकी नजर उतारूँगी। वो पल-पल निहारते हैं, और आँखें भर आती हैं उस ममता से जो दुनिया को थामे हुए है।
छप्पन भोग सजाए जाते हैं, खुद साथ बैठकर खिलाने की चाहत है। वो जग के पालनहार हैं, फिर भी मेरे भी पालनहार हैं। ज्ञान की ज्योति हैं, सीप में छिपे मोती जैसे हैं। उनकी कृपा जहाँ पड़ती है, वहाँ सब कुछ मिल जाता है। हम निर्धन क्या दें उन्हें, जो सबके भाग्य संवारते हैं। बस दिल से पुकार है कि अवध में राम पधारे हैं, और ये जीवन भी उनका हो गया है।
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