कबीर काव्य खंड कक्षा 9 कबीर के दोहे

कबीर काव्य खंड कक्षा 9 कबीर के दोहे हिंदी भावार्थ

सतगुरु हम सूं रीझि करि, एक कह्या परसंग ।
बरस्या बादल प्रेम का, भींजि गया सब अंग॥

Sataguru Ham Soon Reejhi Kari, Ek Kahya Parasang .
Barasya Baadal Prem Ka, Bheenji Gaya Sab Ang .
 
कबीर काव्य खंड कक्षा 9 कबीर के दोहे हिंदी भावार्थ UP Board Kabir Kavy Khand Solutions Class 9 Hindi Chapter 1

दोहे के शब्दार्थ Word Meaning of Kabir Doha.

सतगुरु हम सूं : सतगुरु ने हमसे.
रीझि करि : प्रशन्न होकर / खुश होकर.
एक कह्या परसंग : एक प्रसंग, एक किस्सा.
बरस्या बादल प्रेम का : ईश्वरीय प्रेम बादल/ज्ञान.
भींजि गया सब अंग : सभी अंग भीग गए.

कबीर के दोहे का हिंदी मीनिंग

सतगुरु ने प्रशन्न होकर हमसे एक प्रसंग कहा, किस्सा बताया, ज्ञान की बात बताई. गुरु के प्रेम के बादल बरसने लगे और उससे तन मन सभी भीग गया. भाव है की गुरु के ज्ञान रूपी बरसात में शिष्य को आनंद प्राप्त हुआ है. ज्ञान प्राप्त करके शिष्य का कल्याण हो गया है. सद्गुरु के आगमन पर ही अच्छे गुणों का आगमन होता है. सद्बुद्धि प्राप्त होती है, सद्गुरु के प्रसंग कहने का भाव है की सद्गुरु ने ज्ञान की बातें बताई हैं. कबीर दास के इस दोहे में रूपक अलंकार का उपयोग हुआ है और शांत रस का माधुर्य है.

राम नाम के पटतरै देबै कौं कछु नाहिं।
क्या लै गुरु संतोषिए, हौस रही मन मौहि।
Raam Naam Ke Patatarai Debai Kaun Kachhu Naahin.
Kya Lai Guru Santoshie, Haus Rahee Man Mauhi.
 
राम नाम के पटतरै शब्दार्थ - पटतरै = समान वस्तु, होनी =तीव्र अभिलाषा, हौंस-इच्छा, संतोषिए-संतोष करके चुप रह जाना, माँहि -अंदर।
 
गुरु ने अमूल्य राम का नाम दिया है, भक्ति का मार्ग दिखाया है। गुरु को देने के लिए राम नाम तुल्य कोई वस्तु मेरे पास नहीं है। गुरु को बदले में क्या दूँ, यही सोचकर संतोष कर लिया है (देने को कुछ नहीं है ) गुरु को कुछ देने की इच्छा मन में ही रह गयी क्योंकि बदले में समान महत्त्व की कोई वस्तु मेरे पास नहीं है। इस दोहे में गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है। इस दोहे में अनुप्रास अलंकर का विधान है.

ग्यान प्रकासा गुरु मिला, सों जिनि बीसरिं जाइ।
जब गोविंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आई।।
या
ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या, सो जिनि बीसरि जाइ।
जब गोबिंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥
Gyaan Prakaasya Gur Milya, So Jini Beesari Jai.
Jab Gobind Krpa Karee, Tab Gur Miliya Aai.

दोहे के शब्दार्थ : Word Meaning of Kabir Doha "Gyan Prakasya Guru Milya" in Hindi
ग्यान प्रकासा : ज्ञान रूपी प्रकाश का उद्भव हुआ।
गुरु मिला : गुरु मिले।
सों जिनि : उनको (गुरु )
बीसरिं जाइ : भुलाना नहीं चाहिए।
जब गोविंद कृपा करी : जब ईश्वर की कृपा हुई।
तब गुर मिलिया आइ : तब गुरु की प्राप्ति हुई।

इश्वर की कृपा से गुरु से मिलन संभव हो पाया है. गुरु के मिलने से ही ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न हुआ है. मुझे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए की मैं गुरुदेव के दिए गए सच्चे ज्ञान को कहीं भूल ना जाऊं. कबीर साहेब के इस दोहे ने अनुप्रास अलंकार का उपयोग हुआ है. गोविन्द के अनुग्रह का ही यह परिणाम है इसलिए ऐसे व्यक्तित्व को विस्मृत नहीं करना चाहिए.
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पडंत।
कहै कबीर गुर ग्यान तैं, एक आध उबरंत॥
Maaya Deepak Nar Patang, Bhrami Bhrami Ivain Padant.
Kahai Kabeer Gur Gyaan Tain, Ek Aadh Ubarant.


कबीर साहेब ने माया की तुलना दीपक से और जीव की तुलना पतंगे से की है. नर/जीवात्मा भ्रमित होकर माया रूपी दीपक में भ्रमित होकर इसमें गिर पड़ते हैं. इस भाँती वे अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं. माया से बचाने की राह गुरु ही बताता है. गुरु की कृपा से एकाध व्यक्ति ही माया के भ्रम से मुक्त हो पाता है. कबीर की इस साखी की प्रथम पंक्तियों में सांगरूपक और भ्रमी भ्रमी में पुराक्तिप्रकाश अलंकार की व्यंजना निहित है.

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं ।
प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं ॥
Jab Main Tha Tab Hari Nahin Ab Hari Hai Main Naaheen .
Prem Galee Ati Saankaree Jaamen Do Na Samaaheen.

दोहे के शब्दार्थ Word Meaning of Kabir Doha.
मैं - अहम् ( अहंकार )
हरि - परमेश्वर
जब मैं था तब हरि नहीं : जब अहंकार और अहम् (स्वंय के होने का बोध) होते हैं तब तक ईश्वर की पहचान नहीं होती है।
अब हरि हैं मैं नांहि : अहम् के समाप्त होने पर हरी (ईश्वर का वास होता है ) का भान होता है।
अँधियारा - अंधकार
सब अँधियारा मिटी गया : अंधियारे होता है अहम्, माया, नश्वर जगत के होने का।
जब दीपक देख्या माँहि : अहम् के समाप्त होने के उपरांत अंदर का विराट उजाला दिखाई देता है।

कबीर साहेब के मुताबिक़ जब तक जीवात्मा में "अहम्" रहता है, स्वंय के होने का भाव रहता है, इश्वर की प्राप्ति संभव नहीं हो पाती है. अब जब हरी की प्राप्ति हो गई है तब “अहम्” शेष नहीं रहा है. भाव है की द्वेत की भावना जब तक है भक्ति मार्ग में बाधक है. अहम् के नाश के उपरांत साधक और साध्य के मध्य का भेद समाप्त हो जाता है. प्रेम (भक्ति) मार्ग की गली अत्यंत ही संकरी है जिसमे अहम् और इश्वर एक साथ नहीं समा सकते हैं. माया उसे जीवन के उद्देश्य से विमुख करती है और ऐसा कृतिम आवरण पैदा करती है जिसमे जीव यह भूल जाता है की वह तो यहाँ कुछ दिनों का मेहमान है और माया सदा ही इस जगत में रहेगी, वह कभी मरती नहीं हैं। गुरु के सानिध्य में आने से ही माया का बोध हो पाता है और जीव इसके जाल से मुक्त होकर ईश्वर से साक्षात्कार कर पाता है।

भगति भजन हरि नाँव है, दूजा दुक्ख अपार।
मनसा वाचा कर्मना, कबीर सुमिरन सार॥
Bhagati Bhajan Hari Naanv Hai, Dooja Dukkh Apaar.
Manasa Vaacha Karmana, Kabeer Sumiran Saar.


भक्ति भजन और हरी सुमिरण ही नांव है जिसके माध्यम से भव सागर को पार किया जा सकता है. हरी के नाम के अतिरिक्त दुःख ही दुःख हैं. इसलिए कबीर साहेब कहते हैं की मन, वचन और कर्म से इश्वर का सुमिरन ही जीवन की मुक्ति का आधार है, यही जीवन का सार है. ‘भगति भजन हरि नाँव है’ में रूपक और अनुप्रास अलंकार की व्यंजना है.

कबीर चित्त चमंकिया, चहुँ दिसि लागी लाई।
हरि सुमिरन हाथ घड़ा, बेगे लेहु बुझाई।।
Kabeer Chitt Chamanakiya, Chahu Disi Lagi Lai.
Hari Sumiran Haath Ghada, Beg Lehu Bujhaayi.

दोहे के शब्दार्थ Word Meaning of Kabir Doha.
चित्त = मन। चमंकिया = चकित हो गया, शंकित हो गया। चहुँदिस = चारों ओर। लाइ = आग। सुमिरन = स्मरण, भजन। बेगे = शीघ्र। पारब्रह्म = ईश्वर।उनमान = अनुमान, कल्पना। सोभा = रूप। देख्या = देखा, दर्शन प्राप्त किया। परमान = प्रमाण।

कबीर साहेब कहते हैं की इस संसार/जगत में चारों तरफ विषय वासनाओं और माया के भ्रम की आग लगी हुई है ऐसे मैं मेरा मन भी चकित हो गया है. ऐसे में हरी सुमिरण रूपी घड़े को हाथ में लेकर इसके जल से विषय वासनाओं की अग्नि को बुझाया जा सकता है. चित्त चमंकिया’ और ‘लागी लाइ’ में अनुप्रास तथा ‘हरि सुमिरन हाथों घड़ा” में रूपक अलंकार है।

अंषड़ियाँ झाँई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड्या, राम पुकारि-पुकारि॥
Anshadiyaan Jhaanee Padee, Panth Nihaari-nihaari.
Jeebhadiyaan Chhaala Padya, Raam Pukaari-pukaari.
 
जीवात्मा बड़ी ही उत्सुकता से पूर्ण परमात्मा की राह देख रही है. राह देखते देखते उसकी आँखों में झाई पड गई है, कालापन पड गया है. रास्ता देखते देखते उसकी आँखें थक चुकी हैं. जीवात्मा की जिव्हा पर छाले पद गए हैं राम का नाम पुकारते पुकारते लेकिन ना जाने कब हरी के दर्शन होंगे. यहाँ पर विरह का वर्णन किया गया है जिसमे आत्मा परमात्मा से मिलने को व्याकुल है. उसकी दृष्टि मंद पड़ने लगी है और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा है. विरहणी आत्मा की पूर्ण परमात्मा से मिलने की उत्कंठा का मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है. कबीर की इस साखी में पुनरक्ति प्रकाश और अतिश्योक्ति अलंकार की व्यंजना की गई है.

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।
Jhoothe Sukh Ko Sukh Kahe, Maanat Hai Man Mod.
Khalak Chabaina Kaal Ka, Kuchh Munh Mein Kuchh God.
 
मानव मिथ्या सुख को सुख कहता है और मन ही मन प्रशन्न होता है. जबकि यह सब काल का चबैना है. कुछ संसारी जीव काल के मुंह में हैं और कुछ उसकी गोद में हैं जो कभी भी काल का ग्रास बन सकते हैं. इस साखी में रूपक अलंकार का उपयोग किया गया है और काल का मानवीकरण किया गया है. वस्तुतः अहम् भी एक अन्धकार ही है जो ज्ञान के प्रकाश उत्पन्न हो जाने पर दूर हो जाता है.

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि।
सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माँहि।।
Jab Main Tha Tab Hari Nahin ,ab Hari Hain Main Naanhi.
Sab Andhiyaara Mitee Gaya , Jab Deepak Dekhya Maanhi.
 
मैं - अहम् ( अहंकार )
हरि - परमेश्वर
जब मैं था तब हरि नहीं : जब अहंकार और अहम् (स्वंय के होने का बोध) होते हैं तब तक ईश्वर की पहचान नहीं होती है।
अब हरि हैं मैं नांहि : अहम् के समाप्त होने पर हरी (ईश्वर का वास होता है ) का भान होता है।
अँधियारा - अंधकार
सब अँधियारा मिटी गया : अंधियारे होता है अहम्, माया, नश्वर जगत के होने का।
जब दीपक देख्या माँहि : अहम् के समाप्त होने के उपरांत अंदर का विराट उजाला दिखाई देता है।

जब तक अहंकार था इश्वर/हरी से परिचय नहीं हो पाया. इश्वर से मिलन नहीं हो पाया. जब आत्मा और पूर्ण परमात्मा का भेद समाप्त हो गया, अहंकार समाप्त हो गया तो हरी के दर्शन हो पाए. जब अहम् (मैं) नहीं रहता है तो परमात्मा ही शेष रहता है. अहम् के नाश हो जाने पर इश्वर से परिचय संभव हो पाता है. माया जनित समस्त अन्धकार, विषय वासनाओं और अज्ञान का समस्त अन्धकार उस समय समाप्त हो जाता है जब जीव अपने हृदय में इश्वर रूपी ज्ञान का दीपक देख पाता है. दीपक और अंधियारा में रूपकातिशयोक्ति अलंकार का उपयोग किया गया है.

कबीर कहा गरबियौ उँचे देखी अवास ।
काल्हि परयूं भुईं लेटणा, उपर जामै घास ॥
Kabeer Kaha Garabiyau Unche Dekhee Avaas .
Kaalhi Parayoon Bhueen Letana, Upar Jaamai Ghaas .


कबीर साहेब कहते हैं की ऊँचे आवास को देखकर गर्व नहीं करना चाहिए. धन दौलत और माया पर अभिमान करना व्यर्थ है. एक रोज तो तुमको इस जमीन पर लेटना है और ऊपर घास उगेगी. भाव है की यह जीवन नश्वर है एक रोज यह मिटटी में मिल जाना है और जलाए जाने के उपरान्त इस मिटटी पर घास को उगना है. इसलिए मोह माया पर गर्व करना कोई बुद्धिमानी का कार्य नहीं है. हमें माया के भ्रम से दूर रहकर हरी के नाम का सुमिरण करना चाहिए. कबीर की इस साखी में उपमा और अनुप्रास का उपयोग हुआ है.

ऐसा यहु संसार है, जैसा सैंबल फूल।
दिन दस के व्यौहार में, झूठै रंगि न भूल।।
Aisa Yahu Sansaar Hai, Jaisa Saimbal Phool.
Din Das Ke Vyauhaar Mein, Jhoothai Rangi Na Bhool.


कबीर के अनुसार यह संसार अत्यंत ही क्षणिक है, जैसे सेमल का फूल (सेमल का फूल अत्यंत ही कम समय के लिए पुष्पित होता है.) इस संसार के दस दिन के व्यवहार, अल्प समय के लिए सांसारिक कार्यों में लिप्त होकर स्वंय को मत भूलो. भाव है की इस जीवन का उद्देश्य हरी के नाम का सुमिरण है जिसे हमें विस्मृत नहीं करना चाहिए. जीवन के सभी रंग क्षणिक और अल्प समय के लिए हैं जिनका कोई अस्तित्व नहीं है.

इहि औसरि चेत्या नहीं, पसु ज्यों पाली देह।
राम नाम जाना नहीं, अंत परी मुख खेह।।
Ihi Ausari Chetya Nahin, Pasu Jyon Paalee Deh.
Raam Naam Jaana Nahin, Ant Paree Mukh Kheh.

कबीर साहेब इस साखी में कहते हैं की यदि मानव देह को पाकर तुम सचेत नहीं होते हो और हरी सुमिरण नहीं करते हो तथा पशुओं की भाँती देह को ही पाला है तो एक रोज तुमको मिटटी में ही मिलना होगा. भाव है की राम राम का सुमिरण नहीं किया तो एक रोज तुम इस सुनहरे अवसर को समाप्त कर दोगे. मानव जीवन अनमोल है और यह एक अवसर की भाँती है। इसे व्यर्थ गँवाने में कोई समझदारी नहीं है। अंत में यह शरीर मिटटी हो जाना है इसलिए अवसर को समझ कर हरी का सुमिरण करना चाहिए। 

यह तन काचा कुंभ है, लियाँ फिरै था साथि।
ठपका लागा फुटि गया, कछू न आया हाथि।।
Yah Tan Kaacha Kumbh Hai, Liyaan Phirai Tha Saathi.
Thapaka Laaga Phuti Gaya, Kachhoo Na Aaya Haathi.

यह तन/शरीर कच्चे घड़े की भाँती है। इसे तुम अपना समझ कर इस पर गर्व करते रहे।  जैसे कच्चे घड़े के थोड़ी सी चोट लग जाने पर वह टूट जाता है ऐसे ही एक रोज इस तन को भी समाप्त हो जाना है। यह तन एक ठोकर से टूट जाना है। कुछ हाथ नहीं आएगा। इसलिए हरी सुमिरण ही साथ जाने वाला है। हमें हरी के नाम का आधार लेकर चलना चाहिए, यह जगत और तन हमारा नहीं है। 

कबीर कहा गरबियो, देही देखि सुरंग।
बीछड़ियाँ मिलिबो नहीं, ज्यों काँचली भुवंग।।
Kabeer Kaha Garabiyo, Dehee Dekhi Surang.
Beechhadiyaan Milibo Nahin, Jyon Kaanchalee Bhuvang.

कबीर साहेब ने जीव को चेताया है और शिक्षा दी है की यह तन एक रोज हमसे बिछड़ जाएगा। इस पर गर्व करना उचित नहीं है। जैसे साँप अपनी केचुली को बदल देता है और वह उससे पुनः कभी नहीं मिल पाती है ऐसे ही यह तन एक रोज हमको छोड़ देना है। सुन्दर देह पर घमंड करने के स्थान पर हमें इसे हरी सुमिरण का माध्यम बनाना चाहिए। 
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