कबीर माला मन की और संसारी भेष मीनिंग

कबीर माला मन की और संसारी भेष मीनिंग

कबीर माला मन की, और संसारी भेष।
माला पहर्‌या हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देष॥
Kabir Mala Man Ki, Aur Sansaari Bhesh,
Mala Paharya Hari Mile, To Arhat Ke Gali Desh.
कबीर माला मन की : कबीर साहेब की वाणी है की एक  मन की माला, लाभकारी है.
और संसारी भेष : बाकी सभी तो संसार के वेश हैं, रंग बिरंगे कपडे हैं.
माला पहर्‌या हरि मिलै : माला पहनने से यदि हरी मिलते हैं तो.
तौ अरहट कै गलि देष : तो रहट के गले में पड़ी हुई माला को देखो.
देष : देखो.
माला पहर्‌या : माला को पहनने से.
हरि मिलै : इश्वर मिलते हैं तो.
तौ  तो.
अरहट : रहट, पानी निकालने का यंत्र, रहट.
कै : के.
गलि : गले में.
देष : देखो.
प्रस्तुत साखी में कबीर साहेब की वाणी है की साधक भक्ति करने के नाम पर अपने गले में माला को धारण करता है. लेकिन साहेब ने कहा की यह माला सांसारिक  वेशभूषा बाह्य दिखावे के लिए ही है जिससे सांसारिक लाभ ही मिल सकता है. भक्ति का कोई भी लाभ इससे प्राप्त नहीं किया जा सकता है. गले में विभिन्न प्रकार की माला
धारण करने वाले लोगों के लिए कबीर साहेब का सन्देश है की यह सांसारिक लाभ, उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हो सकता है. यदि गले में मोतियों की माला से लाभ मिलता  है तो रहट को देखो उसमें तो डोलियों की माला पुरे दिन ही घूमती रहती है.
 
Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं कबीर के दोहों को अर्थ सहित, कबीर भजन, आदि को सांझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें

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