मुझे गुरुदेव के चरणों की सेवा मिल गई होती
मुझे गुरुदेव के चरणों की सेवा मिल गई होती
मुझे गुरुदेव के चरणों की,
सेवा मिल गई होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
फंसा हूं मोह माया में,
तुम ही आकर निकालो अब,
ज्ञान की ज्योत से गुरुवर,
तुम ही मुझको निखारो अब,
मुझे भी आपकी थोड़ी,
दया जो मिल गई होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
जगत रिश्तों का बंधन है,
बड़ा गहरा समंदर है,
मुझे विश्वास है इतना,
गुरु करुणा के सागर हैं,
बिखरता यूं नहीं जीवन,
प्रभु माला जपी होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
मुझे गुरुदेव के चरणों की,
सेवा मिल गई होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
सेवा मिल गई होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
फंसा हूं मोह माया में,
तुम ही आकर निकालो अब,
ज्ञान की ज्योत से गुरुवर,
तुम ही मुझको निखारो अब,
मुझे भी आपकी थोड़ी,
दया जो मिल गई होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
जगत रिश्तों का बंधन है,
बड़ा गहरा समंदर है,
मुझे विश्वास है इतना,
गुरु करुणा के सागर हैं,
बिखरता यूं नहीं जीवन,
प्रभु माला जपी होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
मुझे गुरुदेव के चरणों की,
सेवा मिल गई होती,
भटकता यूं नहीं दर दर,
शरण जो मिल गई होती।।
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Author - Saroj Jangir
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