मेरे बांके बिहारी सांवरियां क्यों ये परदे लगाए हुए है

मेरे बांके बिहारी सांवरियां क्यों ये परदे लगाए हुए है

मेरे बाँके बिहारी सांवरियां, 
क्यों ये परदे लगाए हुए हैं,
तेरे नैनों से नैना मिलाने, 
हम भी दर तेरे आए हुए हैं।।

तेरी छुपने की आदत पुरानी,
मैं भी दासी हूँ, तेरी दीवानी,
इश्क़ की चोट खाई है तुमसे,
अपना दिल भी लुटाए हुए हैं,
मेरे बाँके बिहारी सांवरियां, 
क्यों ये परदे लगाए हुए हैं।।

तेरे लाखों-हज़ारों दीवाने,
मेरी गिनती किसी में नहीं है,
फिर भी आए हैं तुमको रिझाने,
नीर आँखों में लाए हुए हैं,
मेरे बाँके बिहारी सांवरियां, 
क्यों ये परदे लगाए हुए हैं।।

जब वो आई करोली की रानी,
तब थे न क्यों ये परदे लगाए,
खोल कर कान सुन लो जी,
तुम तो घर ले जाने के लिए आए हुए हैं,
मेरे बाँके बिहारी सांवरियां, 
क्यों ये परदे लगाए हुए हैं।।


MERE BANKE BIHARI LAL By Alok Krishna | मेरे बांके बिहारी - आलोक कृष्णा

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जीवन में जब आत्मा परमात्मा की खोज में निकलती है, तो उसे अनेक बाधाएँ, पर्दे और दूरी का अनुभव होता है। यह दूरी केवल भौतिक नहीं, बल्कि आंतरिक भी होती है—कभी अहंकार, कभी संकोच, कभी अपने ही मन के संशय। साधक का हृदय तड़पता है, वह अपने आराध्य से मिलन की आकांक्षा में व्याकुल रहता है, परंतु उसे प्रतीत होता है कि कोई अदृश्य परदा उसे अपने प्रिय से अलग किए हुए है। यह परदा कभी उसकी अपनी सीमाएँ, कभी संसार की भीड़, तो कभी उसकी भक्ति की गहराई की परीक्षा भी हो सकता है। इस व्याकुलता में भी एक मधुरता छुपी होती है, क्योंकि यही तड़प साधक को और अधिक समर्पण, प्रेम और विनम्रता की ओर ले जाती है।

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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