लक्ष्मी मंत्र जानिये अर्थ और महत्त्व सरल अर्थ में
लक्ष्मी मंत्र जानिये अर्थ और महत्त्व सरल अर्थ में
ओंकार रूपिणी,
लक्ष्मिर्विष्णु हृदय संस्थिता,
विश्वाँगनंदिनी नंदा,
नंदाक्षबिन्दु रूपिणी,
हस्तिनी पद्मिनी चक्रा,
सुप्रामयक्तमयाक्षिणी,
विश्वशक्ति हृतिख्याता,
स्वानन्दशक्ति रूपिणी,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्,
चतु:र्षष्टि सुपिधस्था,
कोटि चंद्र सम प्रभा,
आकरदत्रहृता शक्तिर्मोहिनी,
मंत्र योगिनी,
ब्रह्माण्ड कोटि संयुक्ता,
बारहिहंस वाहिनी,
नागतिंदु कला,
शक्तिर्योगी स्थान संस्थिता,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्,
शास्त्रस्थाना उमा पद्मा,
पद्माक्षिज्वाल शोभिता,
ज्वालाज्वलन दीक्षांता,
महादेव्यैति सुप्रभा,
सूर्यकोटि प्रतीकाशा,
चंद्रकोटि सुशीतला,
सर्वमूर्ति कलासूक्ष्मा,
ब्रह्म रूप व्यवस्थिता,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्,
अकारो ब्रह्मणो रूप,
मुकारो विष्णु एव च,
मकारो रुद्र मित्याहू,
रेतः प्रणव देवत:,
ओंकार संस्थितं च अपि,
तथा शक्ति कयंविदहू,
ओंकारो ध्यायते येने,
सर्व पाप प्रमुच्यते,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।
लक्ष्मिर्विष्णु हृदय संस्थिता,
विश्वाँगनंदिनी नंदा,
नंदाक्षबिन्दु रूपिणी,
हस्तिनी पद्मिनी चक्रा,
सुप्रामयक्तमयाक्षिणी,
विश्वशक्ति हृतिख्याता,
स्वानन्दशक्ति रूपिणी,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्,
चतु:र्षष्टि सुपिधस्था,
कोटि चंद्र सम प्रभा,
आकरदत्रहृता शक्तिर्मोहिनी,
मंत्र योगिनी,
ब्रह्माण्ड कोटि संयुक्ता,
बारहिहंस वाहिनी,
नागतिंदु कला,
शक्तिर्योगी स्थान संस्थिता,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्,
शास्त्रस्थाना उमा पद्मा,
पद्माक्षिज्वाल शोभिता,
ज्वालाज्वलन दीक्षांता,
महादेव्यैति सुप्रभा,
सूर्यकोटि प्रतीकाशा,
चंद्रकोटि सुशीतला,
सर्वमूर्ति कलासूक्ष्मा,
ब्रह्म रूप व्यवस्थिता,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्,
अकारो ब्रह्मणो रूप,
मुकारो विष्णु एव च,
मकारो रुद्र मित्याहू,
रेतः प्रणव देवत:,
ओंकार संस्थितं च अपि,
तथा शक्ति कयंविदहू,
ओंकारो ध्यायते येने,
सर्व पाप प्रमुच्यते,
महादेव्यै च विद्महे,
विष्णु पत्न्यै च धीमहि,
तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।
लक्ष्मी मंत्र का यह विस्तृत वर्णन देवी लक्ष्मी की महिमा और उनकी आध्यात्मिक शक्ति को प्रकट करता है। यह मंत्र भक्तों के जीवन में समृद्धि, शांति और शुभता लाने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
सरल अर्थ ओंकार रूपिणी लक्ष्मी: लक्ष्मी ओंकार का रूप हैं, जो सृष्टि के मूल में स्थित हैं।
विष्णु हृदय संस्थिता: देवी विष्णु के हृदय में निवास करती हैं।
विश्वशक्ति और आनंदस्वरूपा: वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति और आनंद का स्वरूप हैं।
महादेवी रूप: लक्ष्मी को महादेवी कहा गया है, जो ब्रह्माण्ड की संरचना और पालन का आधार हैं।
महत्त्व इस मंत्र का नियमित जाप करने से जीवन में धन, वैभव और सुख-शांति का आगमन होता है।
लक्ष्मी को विष्णु की शक्ति के रूप में पूजा जाता है, जो भक्तों के पापों का नाश करती हैं और उनकी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं।
यह मंत्र मानसिक और भौतिक समृद्धि का प्रतीक है और शुद्धता तथा आत्मिक विकास को बढ़ावा देता है।
विशेष मंत्र में महादेव्यै च विद्महे, विष्णु पत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् का बार-बार उच्चारण देवी लक्ष्मी की कृपा को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह पंक्तियाँ उनके आशीर्वाद और शक्ति को प्राप्त करने के लिए केंद्रीय हैं।
सरल अर्थ ओंकार रूपिणी लक्ष्मी: लक्ष्मी ओंकार का रूप हैं, जो सृष्टि के मूल में स्थित हैं।
विष्णु हृदय संस्थिता: देवी विष्णु के हृदय में निवास करती हैं।
विश्वशक्ति और आनंदस्वरूपा: वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति और आनंद का स्वरूप हैं।
महादेवी रूप: लक्ष्मी को महादेवी कहा गया है, जो ब्रह्माण्ड की संरचना और पालन का आधार हैं।
महत्त्व इस मंत्र का नियमित जाप करने से जीवन में धन, वैभव और सुख-शांति का आगमन होता है।
लक्ष्मी को विष्णु की शक्ति के रूप में पूजा जाता है, जो भक्तों के पापों का नाश करती हैं और उनकी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं।
यह मंत्र मानसिक और भौतिक समृद्धि का प्रतीक है और शुद्धता तथा आत्मिक विकास को बढ़ावा देता है।
विशेष मंत्र में महादेव्यै च विद्महे, विष्णु पत्न्यै च धीमहि, तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् का बार-बार उच्चारण देवी लक्ष्मी की कृपा को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह पंक्तियाँ उनके आशीर्वाद और शक्ति को प्राप्त करने के लिए केंद्रीय हैं।
Laxmi Mantra | Vedic Mantra | Lakhsmi Mantra लक्ष्मी मंत्र वैदिक मंत्र Laxmi Song | Bhakti Song
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देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम ॥१॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पच्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम ॥५॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम ॥७॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम ॥११॥
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
॥इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्॥
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम ॥१॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पच्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम ॥५॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम ॥७॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम ॥११॥
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥
॥इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्॥
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Title :- Devyaparadha Kshamapan Stotra
Singer :- Mahesh Hiremath, Shubhangi Joshi
Music Label :- Bhakti Vision Entertainment
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