कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी

कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी

 
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी

कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी,
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी,
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।।

नौ मास गर्भ में रखा, अथाह वेदना सही,
ममता की छाँव में, मेरे जीवन की नींव रखी।
हर दुआ माँ की, मेरी ढाल है प्रभुजी,
हर दुआ माँ की, मेरी ढाल है प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी,
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।।

थाम के ऊँगली मेरी, चलना सिखाया,
बाबा ने जीवन का, हर सबक सिखाया।
उनका हाथ सिर पे, मेरे संबल प्रभुजी,
उनका हाथ सिर पे, मेरे संबल प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी,
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।।

सृष्टि पे अपनी जब तुझे प्यार आया,
सबके संग रहूँ कैसे, ये ख्याल आया।
बन के मात-पिता, तुम जग में आये प्रभुजी,
बन के मात-पिता, तुम जग में आये प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी,
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।।

मात-पिता हैं पहले ईश्वर मेरे,
पहले गुरु, पहले सखा भी हैं मेरे।
पहले जाना मात-पिता, फिर तुमको प्रभुजी,
पहले जाना मात-पिता, फिर तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी,
कैसे कह दें देखा नहीं तुमको प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।
मात-पिता में फिर कौन है प्रभुजी।।


Kaise Keh De Bhajan

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Wrtien & Sung by Ranjana Gunjan Bhartia 
Music by Sakal Deo Sahni
 
माता-पिता वह प्रत्यक्ष स्वरूप हैं जहाँ ईश्वर की अनुभूति सहज ही होती है। गर्भ से लेकर जीवन की हर अवस्था तक उनका त्याग, प्रेम और अनुकंपा संतान के लिए ढाल और आश्रय बनते हैं। माँ की असीम वेदना और वात्सल्य, पिता का अनुशासन और संरक्षण—ये सब केवल साधारण कर्तव्य नहीं, बल्कि दिव्य करुणा की अभिव्यक्ति हैं। उनके बलिदान और स्नेह से ही जीवन की नींव मजबूत होती है और संसार का प्रत्येक पहला कदम सुरक्षित बन पाता है। जो करुणा माँ के आँचल में और जो संबल पिता के हाथों में मिलता है, वही सत्य में ईश्वर का आशीर्वाद है।

जब सृष्टि को रचने वाले प्रभु ने जगत को सँवारने का विचार किया, तब माता-पिता का स्वरूप उस कार्य का माध्यम बना। वे पहले शिक्षक, पहले साथी और पहले मार्गदर्शक होते हैं, यहीं से बच्चे का संसार और आस्था का बीज अंकुरित होता है। माता-पिता की सेवा और सम्मान ही परमात्मा के स्मरण और आराधना का प्रथम द्वार कहा जा सकता है, क्योंकि उनके द्वारा ही हम जीवन के वास्तविक अर्थ को जान पाते हैं। जिसने माता-पिता में प्रभु का रूप देख लिया, उसके लिए ईश्वर को न देख पाने का प्रश्न ही नहीं उठता—वह संतान हर क्षण उनके प्रेम और मार्गदर्शन के माध्यम से प्रभु-सान्निध्य का आनंद अनुभव करती रहती है।
 
Saroj Jangir Author Admin - Saroj Jangir

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