उत्तर काण्ड अर्थ सहित

उत्तर काण्ड-21 Tulsi Das Ram Charit Mans

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।
संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।।
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।।
अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।।
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।।
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।।
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।।
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।
दो0-मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस।
उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस।।129।।

यह संसार के दुखों की दवा है, जिसे वेद और संत गाते हैं। इसमें भक्ति के सात सुंदर सोपान हैं, जो राम की भक्ति का रास्ता दिखाते हैं। जिस पर हरि की कृपा होती है, वही इस मार्ग पर चलता है। जो मनुष्य बिना छल के इस कथा को गाता है, उसकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। जो इसे कहते, सुनते और सराहते हैं, वे संसार सागर को गो के खुर जितनी आसानी से पार कर लेते हैं। कथा सुनकर पार्वती का हृदय प्रसन्न हुआ और उन्होंने कहा कि प्रभु की कृपा से उनका संदेह मिट गया, राम के चरणों में नया प्रेम जगा।
 
यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा।।
भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।।
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं।।
रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।।
एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।।
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।।
जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।।
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।।
छं0-पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।1।।
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।।
सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै।।2।।
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।।
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।3।।
दो0-मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।
श्लोक-यत्पूर्व प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम्।
मत्वा तद्रघुनाथमनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये
भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्।।1।।
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।
मासपारायण, तीसवाँ विश्राम
नवान्हपारायण, नवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
सप्तमः सोपानः समाप्तः।
(उत्तरकाण्ड समाप्त)

यहाँ शिव-पार्वती का संवाद है, जो सुख देता है और दुख मिटाता है। यह संसार के भय को तोड़ता है, संदेह दूर करता है और संतों को प्रिय है। राम के भक्तों के लिए इससे बढ़कर कुछ नहीं। यह कथा राम की कृपा से गाई गई है, जो कलियुग में सबसे बड़ा साधन है। राम का स्मरण, गुणगान और निरंतर श्रवण ही मुक्ति का रास्ता है। राम का भजन करने से कौन नहीं तर गया? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज जैसे पापियों को भी उन्होंने तारा। यह कथा मन की गंदगी धोती है और राम धाम पहुँचाती है। राम दयालु हैं, अनाथों पर प्रेम करते हैं और तुलसीदास जैसे मंदबुद्धि को भी विश्राम देते हैं। कोई भी उनके समान नहीं। वे मेरे लिए वैसे ही प्रिय हैं जैसे कामी को नारी और लोभी को धन।
 
आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की।।
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद।
सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी।।1।।
गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस।
मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की।।2।।
गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी।
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड के ही की।।3।।
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की।
दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की।।4।।
 
ब्रह्मा, नारद, वाल्मीकि, शुक, सनक, शेष, शारदा और हनुमान जैसे महान लोग इसकी प्रशंसा करते हैं। वेद, पुराण, अठारह शास्त्र और सभी ग्रंथ इसके रस से भरे हैं, जो संतों और मुनियों की सबसे बड़ी संपत्ति है और सबकी सहमति से इसका सार है। शिव, पार्वती, व्यास, कबीर, कागभुसुंडि और गरुड़ जैसे संत और ज्ञानी इसे गाते हैं। यह कलियुग के पापों को हरती है, सांसारिक सुखों को फीका करती है, मुक्ति को सुंदर बनाती है, और भव रोग को नष्ट कर अमृत प्रदान करती है। 
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