
भोले तेरी भक्ति का अपना ही
1. साधु भया तो क्या भया, माला पहिरी चार।
बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भंगार॥
अर्थ: साधु बनने के लिए केवल माला पहनना और बाहरी आचार-व्यवहार बदलना पर्याप्त नहीं है। भीतर की बुराइयों और विकारों को दूर करना आवश्यक है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि बाहरी रूप से साधु बनने से कुछ नहीं होता, भीतर की सफाई जरूरी है।
2. तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय।
सहजै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय॥
अर्थ: शरीर से योगी बनना सरल है, लेकिन मन को योगी बनाना कठिन है। जो व्यक्ति मन को साधता है, वह सहज ही सिद्धि प्राप्त करता है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि मन की साधना सबसे महत्वपूर्ण है।
3. जौ मानुष गृह धर्म युत, राखै शील विचार।
गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच, सेवा सार॥
अर्थ: जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन में रहते हुए शील और विचारशीलता को बनाए रखता है, वह सच्चा साधक है। गुरु की वाणी, साधु-संगति, और मन, वचन, सेवा में एकता से जीवन सार्थक होता है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी साधना संभव है।
4. शब्द विचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव।
क्या रमता क्या बैठता, क्या गृह कंदला छाँव॥
अर्थ: जो व्यक्ति शब्द (ध्यान) पर विचार करके पथ पर चलता है, वह ज्ञान की गली में पाँव रखता है। वह न तो रमता है, न बैठता है, न गृहस्थ है, न संन्यासी है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि सच्चा साधक किसी विशेष स्थिति में नहीं बंधा होता।
5. गिरही सुवै साधु को, भाव भक्ति आनन्द।
कहैं कबीर बैरागी को, निरबानी निरदुन्द॥
अर्थ: गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी साधु भाव, भक्ति, और आनंद को प्राप्त किया जा सकता है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि केवल संन्यास लेने से कुछ नहीं होता, भीतर का भाव महत्वपूर्ण है।
6. पाँच सात सुमता भरी, गुरु सेवा चित लाय।
तब गुरु आज्ञा लेय के, रहे देशान्तर जाय॥
अर्थ: जब व्यक्ति में सुमति (सही बुद्धि) भर जाती है और गुरु की सेवा में मन लग जाता है, तब गुरु की आज्ञा से वह देश-विदेश में जाता है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि गुरु की सेवा से जीवन में सुमति आती है।
7. गुरु के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दुख।
कहैं कबीर तो दुख पर वारों, कोटिक सूख॥
अर्थ: जो व्यक्ति गुरु के सामने रहता है, वह दुखों की कसौटी पर खरा उतरता है। कबीर दास जी यह कहते हैं कि गुरु की उपस्थिति में दुख भी सुख में बदल जाता है।