कबीर दास के दोहे अर्थ सहित जानिये

कबीर दास के दोहे अर्थ सहित जानिये

स्वाँग पहरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि । जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि ॥

 
स्वाँग पहरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि ।
जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि ॥
चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात ।
एक निस प्रेही निरधार का गाहक गोपीनाथ ॥
एष ले बूढ़ी पृथमी, झूठे कुल की लार ।
अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार ॥
कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर ।
रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस ॥
सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत ।
लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलै जमात ॥
गाँठी दाम न बांधई, नहिं नारी सों नेह ।
कह कबीर ता साध की, हम चरनन की खेह ॥
निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह ।
विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह ॥
जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूं छाना होइ ।
जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ ॥
काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि ।
कबीर बिचारा क्या कहै, जाकि सुख्देव बोले साख ॥
राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई ।
तंबोली के पान ज्यूं, दिन-दिन पीला होई ॥
पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ ।
चित चकमक लागै नहीं, ताथै घूवाँ है-है जाइ ॥
फाटै दीदै में फिरौं, नजिर न आवै कोई ।
जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूं छाना होई ॥
हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि ।
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि ॥
जिहिं धरि साध न पूजि, हरि की सेवा नाहिं ।
ते घर भड़धट सारषे, भूत बसै तिन माहिं ॥
कबीर कुल तौ सोभला, जिहि कुल उपजै दास ।
जिहिं कुल दास न उपजै, सो कुल आक-पलास ॥
क्यूं नृप-नारी नींदिये, क्यूं पनिहारी कौ मान ।
वा माँग सँवारे पील कौ, या नित उठि सुमिरैराम ॥
कबीर संसा कोउ नहीं, हरि सूं लाग्गा हेत ।
काम-क्रोध सूं झूझणा, चौडै मांड्या खेत ॥
कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ मांडै झूझ ।
पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज ॥
जिस मरनै यैं जग डरै, सो मेरे आनन्द ।
कब मरिहूँ कब देखिहूँ पूरन परमानंद ॥
 

स्वाँग पहरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि।
जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि॥

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति साधु का वेश धारण करके सोया रहता है और खा-पीकर आलसी बना रहता है, उसने वह मार्ग बंद कर लिया है जिससे सच्चे साधु निकलते हैं। अर्थात्, केवल बाहरी वेश धारण करने से कोई साधु नहीं बनता, आंतरिक साधना आवश्यक है।

चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात।
एक निस प्रेही निरधार का गाहक गोपीनाथ॥

अर्थ: चतुराई से हरि (ईश्वर) नहीं मिलते, यह केवल बातों की बात है। गोपीनाथ (कृष्ण) तो एकनिष्ठ प्रेमी और निराधार (निस्वार्थ) भक्त के ग्राहक हैं।

एष ले बूढ़ी पृथमी, झूठे कुल की लार।
अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार॥

अर्थ: यह पृथ्वी झूठे कुल के गर्व से बूढ़ी हो गई है। आलसी व्यक्ति ने भेष में ही सब कुछ भुला दिया है और काली धार (माया) में डूब गया है।

कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर।
रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस॥

अर्थ: कबीर कहते हैं, जिसे हरि (ईश्वर) प्रिय होते हैं, उसका शरीर पतला होता है। रात में नींद नहीं आती और शरीर पर मांस नहीं चढ़ता।

सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत।
लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलै जमात॥

अर्थ: सिंहों के झुंड नहीं होते, हंसों की पंक्तियाँ नहीं होतीं, लाल (मूल्यवान रत्न) बोरियों में नहीं होते, उसी प्रकार सच्चे साधु समूह में नहीं चलते।

गाँठी दाम न बांधई, नहिं नारी सों नेह।
कह कबीर ता साध की, हम चरनन की खेह॥

अर्थ: जो साधु अपनी गाँठ में धन नहीं बांधता और नारी से नेह (प्रेम) नहीं करता, कबीर कहते हैं, हम ऐसे साधु के चरणों की धूल हैं।

निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह।
विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह॥

अर्थ: जो व्यक्ति बिना बैर और बिना कामना के साईं (ईश्वर) से प्रेम करता है, जो विषयों से दूर रहता है, वह संतों का अंग (साथी) है।

जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूं छाना होइ।
जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ॥

अर्थ: जिस हृदय में हरि (ईश्वर) आ गए हैं, वह कैसे छिप सकता है? चाहे जितना भी दबाने का प्रयास करें, फिर भी वह उजाला प्रकट हो ही जाता है।

काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि।
कबीर बिचारा क्या कहै, जाकि सुख्देव बोले साख॥

अर्थ: यदि कोई काम (प्रयास) राम (ईश्वर) से मिलाता है, तो उसे जानकर रखना चाहिए। कबीर क्या कहें, जब स्वयं शुकदेव ने इसकी साख (गवाही) दी है।

राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई।
तंबोली के पान ज्यूं, दिन-दिन पीला होई॥

अर्थ: राम (ईश्वर) के वियोग में तन (शरीर) बिकल (व्याकुल) हो जाता है, लेकिन उसे कोई नहीं पहचानता। जैसे तंबोली (पान बेचने वाला) के पान दिन-प्रतिदिन पीले हो जाते हैं।

पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ।
चित चकमक लागै नहीं, ताथै घूवाँ है-है जाइ॥

अर्थ: राम (ईश्वर) अग्नि के समान हैं, जो प्रत्येक घट (शरीर) में समाए हुए हैं। लेकिन यदि चित्त (मन) चकमक (पत्थर) से नहीं लगता, तो धुआँ (मोह) कैसे जाएगा?

फाटै दीदै में फिरौं, नजिर न आवै कोई।
जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूं छाना होई॥

अर्थ: मेरी आँखें फटी जा रही हैं, लेकिन मुझे कुछ दिखाई नहीं देता। जिस घट (हृदय) में मेरा साईं (ईश्वर) है, वह कैसे छिप सकता है?

हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि।
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि॥

अर्थ: घोड़ों, हाथियों, घने धन और छत्रपति की रानी की तुलना हरिजन (ईश्वर के भक्त) की पनिहारिन (जल लाने वाली) से नहीं की जा सकती।

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