बोली ठोली मस्खरी हँसी खेल हराम मीनिंग
बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम |
मद माया और इस्तरी, नहि सन्त के काम ||
Boli Tholi Maskhari, Hansi Khel Haram,
Mad Maya Aur Istari, Nahi Sant Ke Kaam.
कबीर के दोहे का हिंदी मीनिंग (अर्थ/भावार्थ)
इस दोहे में कबीर साहेब का सन्देश है की हंसी मजाक, ठिठोली करना साधू और संतों के काम नहीं हैं, संतों को ये शोभा नहीं देता है। मद, माया और स्त्री गमन से संतों को दूर रहना चाहिए चूँकि ये सभी माया के ही रूप हैं और साधू को भक्ति मार्ग से विमुख करते हैं। इस दोहे में संत कबीर दास जी ने संतों के लिए कुछ आचरण के नियम बताए हैं। इन नियमों का पालन करके ही संत अपने आध्यात्मिक विकास को प्राप्त कर सकते हैं। इस दोहे में, "बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम" का अर्थ है कि संतों को अपनी वाणी, व्यवहार और कार्यों में सावधानी रखनी चाहिए। उन्हें व्यर्थ की बातें नहीं करनी चाहिए, हँसी-मजाक नहीं करना चाहिए और खेल-तमाशे में नहीं पड़ना चाहिए।
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Author - Saroj Jangir
दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं एक विशेषज्ञ के रूप में रोचक जानकारियों और टिप्स साझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें।
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