चहूँ दिस ठाढ़े सूरमा हाथ लिये तलवार मीनिंग
चहूँ दिस ठाढ़े सूरमा हाथ लिये तलवार मीनिंग
चहूँ दिस ठाढ़े सूरमा हाथ लिये तलवार ।
सबही यह तन देखता, काल ले गया मार ।।
सबही यह तन देखता, काल ले गया मार ।।
या
चहूँ दिस ठाढ़े सूरमा हाथ लिये तलवार ।
सबही यह तन देखता, काल ले गया मात ।।
चहूँ दिस ठाढ़े सूरमा हाथ लिये तलवार ।
सबही यह तन देखता, काल ले गया मात ।।
Chahoon Dis Thaadhe Soorama Haath Liye Talavaar .
Sabahee Yah Tan Dekhata, Kaal Le Gaya Maar ..
Ya
Chahoon Dis Thaadhe Soorama Haath Liye Talavaar .
Sabahee Yah Tan Dekhata, Kaal Le Gaya Maat
Sabahee Yah Tan Dekhata, Kaal Le Gaya Maar ..
Ya
Chahoon Dis Thaadhe Soorama Haath Liye Talavaar .
Sabahee Yah Tan Dekhata, Kaal Le Gaya Maat
दोहे की व्याख्या हिंदी में : यह जीवन क्षणिक है, एक रोज सांसों के समंदर सभी का रीत जाना है भले ही कोई साधारण व्यक्ति हो या कोई सूरमा। सूरमा चारों दिशाओं में खड़े हैं और पहरे दे रहे हैं, काल आता है और अपने साथ ले जाता है। राजा महाराजाओं की सुरक्षा के लिए ना जाने कितने सूरमा सुरक्षा के लिए लगे होते थे लेकिन काल कहीं से दबे पाँव आता है और अपने साथ लेकर चला जाता है। दोहे का मूल भाव है की कोई भले ही कितनी ही सुरक्षा करे इस देह की जितने साँसे मालिक ने डाली हैं उतनी ही मिलने वाली है, काल किसी से ना तो डरता है और ना ही किसी को रियायत ही देता है। अन्य स्थान पर कबीर समझाते हैं की हम पता है की काल अवश्य आना है तो क्यों ना इस जीवन में हरी का सुमिरन कर लिया जाय ताकि हम "बंधिया जमपुर" ना जाएँ और सहर्ष आदर के साथ काल के साथ में जाएँ।
चहूँ दिस ठाढ़े सूरमा हाथ लिये तलवार
कबीर गाफील क्यों फिरय, क्या सोता घनघोर
तेरे सिराने जाम खड़ा, ज्यों अंधियारे चोर।
कबीर जीवन कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ
कलहि अलहजा मारिया, आज मसाना ठीठ।
कबीर टुक टुक देखता, पल पल गयी बिहाये
जीव जनजालय परि रहा, दिया दमामा आये।
कबीर पगरा दूर है, आये पहुचै सांझ
जन जन को मन राखती, वेश्या रहि गयी बांझ।
कबीर हरि सो हेत कर, कोरै चित ना लाये
बंधियो बारि खटीक के, ता पशु केतिक आये।
तेरे सिराने जाम खड़ा, ज्यों अंधियारे चोर।
कबीर जीवन कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ
कलहि अलहजा मारिया, आज मसाना ठीठ।
कबीर टुक टुक देखता, पल पल गयी बिहाये
जीव जनजालय परि रहा, दिया दमामा आये।
कबीर पगरा दूर है, आये पहुचै सांझ
जन जन को मन राखती, वेश्या रहि गयी बांझ।
कबीर हरि सो हेत कर, कोरै चित ना लाये
बंधियो बारि खटीक के, ता पशु केतिक आये।
कबीर साहेब इन इस दोहे में स्वंय / आत्मा का परिचय देते हुए स्पष्ट किया है की मैं कौन हूँ,
जाती हमारी आत्मा, प्राण हमारा नाम।
अलख हमारा इष्ट, गगन हमारा ग्राम।।
जब आत्मा चरम रूप से शुद्ध हो जाती है तब वह कबीर कहलाती है जो सभी बन्धनों से मुक्त होकर कोरा सत्य हो जाती है। कबीर को समझना हो तो कबीर को एक व्यक्ति की तरह से समझना चाहिए जो रहता तो समाज में है लेकिन समाज का कोई भी रंग उनकी कोरी आत्मा पर नहीं चढ़ पाता है। कबीर स्वंय में जीवन जीने और जीवन के उद्देश्य को पहचानने का प्रतिरूप है। कबीर का उद्देश्य किसी का विरोध करना मात्र नहीं था अपितु वे तो स्वंय में एक दर्शन थे, उन्होंने हर कुरीति, बाह्याचार, मानव के पतन के कारणों का विरोध किया और सद्ऱाह की और ईशारा किया। कबीर के विषय में आपको एक बात हैरान कर देगी। कबीर के समय सामंतवाद अपने प्रचंड रूप में था और सामंतवाद की आड़ में उनके रहनुमा मजहब के ठेकेदार अपनी दुकाने चला रहे थे। जब कोई विरोध का स्वर उत्पन्न होता तो उसे तलवार की धार और देवताओं के डर से चुप करवा दिया जाता। तब भला कबीर में इतना साहस कहाँ से आया की उन्होंने मुस्लिम शासकों के धर्म में व्याप्त आडंबरों का विरोध किया और सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा भी की। कबीर का यही साहस हमें आश्चर्य में डाल देता है।
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