भगवान शिव को महादेव क्यों कहा जाता है?
भगवान शिव को महादेव कहा जाता है क्योंकि वह स्वयंभू, अजन्मा और निराकार ज्योति स्वरूप हैं। शिव का अर्थ है आत्मा और मन का योग, जो महादेव की अवस्था को परिभाषित करता है। शिव तत्व में सदाशिव त्रिदेवों के भी जनक माने जाते हैं। शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शिव के माता-पिता नहीं थे, क्योंकि वे स्वयं से उत्पन्न हुए हैं। उनकी लीला और स्वरूप को पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं है। उनका शिवलिंग स्वरूप उनकी निराकार स्थिति का प्रतीक है, जिसके माध्यम से उनकी पूजा की जाती है।

शिव महादेव सृष्टि के निर्माण, पालन और विनाश के आधार हैं। उनके निराकार और साकार दोनों रूपों की पूजा होती है। साकार रूप में उन्होंने सभी देवी-देवताओं को जन्म दिया। शिव शंकर महादेव सर्वदेवमय हैं, अर्थात वे सभी देवताओं में और सभी देवता उनमें निवास करते हैं। वे सत्य, ज्ञान और अनंत शक्ति के प्रतीक हैं। उनके अद्वितीय स्वरूप को समझने के लिए पूर्ण गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है, क्योंकि वही आत्मा और परमात्मा के भेद का ज्ञान दे सकता है।
भगवान शिव को "सत्यम शिवम सुंदरम" कहा जाता है, क्योंकि वे सत्य, सुंदर और कल्याणकारी हैं। वे जन्म-मरण से मुक्त हैं और समस्त आत्माओं के परमपिता हैं। सभी धर्मों में शिव को किसी न किसी रूप में पूजा जाता है। जैसे, इस्लाम में अल्लाह नूर, क्रिश्चन में गॉड इज लाइट, और सिख धर्म में "एक ओंकार" के रूप में। शिव की यही विशेषता उन्हें देवों के देव महादेव बनाती है।
भगवान शिव की पूजा उनके निराकार ज्योतिर्लिंग स्वरूप में की जाती है, क्योंकि उनका कोई स्वरूप नहीं है। वे अनादि, अविनाशी, और सृष्टि के मूल हैं। उनके अनेक नाम और रूप हैं, जैसे सोमनाथ, विश्वनाथ, और महाकाल, जो उनके विविध गुणों को दर्शाते हैं। भगवान शिव का यही व्यापक और समावेशी स्वरूप उन्हें न केवल हिंदू धर्म में, बल्कि समस्त मानवता के लिए पूजनीय बनाता है।
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Tag : Shiv Ko Mahadev Kyo Kahate Hain, Shiv Mahadev Ka Arth
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Author - Saroj Jangir
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