कबीर के दोहे सरल भावार्थ सहित
मथुरा जाउ भावे द्वारिका, भावै जाउ जगनाथ ।
साथ-संगति हरि-भागति बिन-कछु न आवै हाथ ॥
कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाइ ।
दुर्मति दूरि बंबाइसी, देसी सुमति बताइ ॥ ॥
उज्जवल देखि न धीजिये, वग ज्यूं माडै ध्यान ।
धीर बौठि चपेटसी, यूँ ले बूडै ग्यान ॥
जेता मीठा बोलरगा, तेता साधन जारिग ।
पहली था दिखाइ करि, उडै देसी आरिग ॥
जानि बूझि सांचहिं तर्जे, करै झूठ सूँ नेहु ।
ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु ॥
कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै ।
नहिंतर बेगि उठाइ, नित का गंजर को सहै ॥
कबीरा बन-बन मे फिरा, कारणि आपणै राम ।
राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सवेरे काम ॥
कबीर मन पंषो भया, जहाँ मन वहाँ उड़ि जाय ।
जो जैसी संगति करै, सो तैसे फल खाइ ॥
कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई ।
जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ ॥
माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाई ।
ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ ॥ मथुरा जाउ भावे द्वारिका, भावै जाउ जगनाथ। साथ-संगति हरि-भागति बिन-कछु न आवै हाथ॥
अर्थ: कबीर कहते हैं कि चाहे आप मथुरा, द्वारिका, या जगन्नाथ पुरी जैसे तीर्थ स्थानों पर जाएं, लेकिन यदि आपके पास सत्संग (सज्जनों की संगति) और हरि-भक्ति नहीं है, तो आपको कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।
कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाइ। दुर्मति दूरि बंबाइसी, देसी सुमति बताइ॥
अर्थ: कबीर सलाह देते हैं कि साधु-संतों की संगति शीघ्र करनी चाहिए, क्योंकि उनकी संगति से बुरी बुद्धि दूर होती है और अच्छी बुद्धि प्राप्त होती है।
उज्जवल देखि न धीजिये, वग ज्यूं माडै ध्यान। धीर बौठि चपेटसी, यूँ ले बूडै ग्यान॥
अर्थ: चमक-दमक देखकर मोहित न हों, जैसे बगुला ध्यानमग्न दिखता है, लेकिन जैसे ही अवसर मिलता है, वह मछली को पकड़ लेता है। इसी प्रकार, बाहरी आडंबर से धोखा न खाएं।
जेता मीठा बोलरगा, तेता साधन जारिग। पहली था दिखाइ करि, उडै देसी आरिग॥
अर्थ: जो व्यक्ति मीठे बोल बोलता है, वह उतना ही साधनों (संसाधनों) को नष्ट करने वाला होता है। पहले तो वह मित्रता दिखाता है, लेकिन बाद में स्वार्थ के लिए दूर हो जाता है।
जानि बूझि सांचहिं तर्जे, करै झूठ सूँ नेहु। ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु॥
अर्थ: जो जानबूझकर सत्य को त्यागता है और झूठ से प्रेम करता है, उसकी संगति से भगवान भी बचने की सलाह देते हैं, जैसे स्वप्न में भी विष नहीं पीना चाहिए।
कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै। नहिंतर बेगि उठाइ, नित का गंजर को सहै॥
अर्थ: कबीर कहते हैं, उसकी संगति करो, जिसके हृदय में तुम बसे हो। अन्यथा, शीघ्र ही उठ जाओ, क्योंकि नित्य के कलह को कौन सह सकता है।
कबीरा बन-बन मे फिरा, कारणि आपणै राम। राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सवेरे काम॥
अर्थ: कबीर कहते हैं, मैं अपने राम की खोज में वन-वन भटका। जब राम जैसे भक्त मिले, तो मेरे सभी कार्य सफल हो गए।
कबीर मन पंषो भया, जहाँ मन वहाँ उड़ि जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसे फल खाइ॥
अर्थ: कबीर कहते हैं, मन पक्षी के समान है, जहाँ चाहे उड़ जाता है। जो जैसी संगति करता है, उसे वैसे ही फल मिलते हैं।
कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई। जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ॥
अर्थ: कबीर कहते हैं, खाई (नाला) कितनी भी गहरी क्यों न हो, कोई उसका पानी नहीं पीता। लेकिन जब वह गंगा से मिल जाती है, तो गंगाजल बन जाती है।
माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाई। ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ॥
अर्थ: मक्खी गुड़ में फंसकर अपने पंख लपेट लेती है। वह ताली पीटती है और सिर हिलाती है, लेकिन मीठे के लोभ में फंसी रहती है।
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