तेरी यादों का वो मंज़र मुझे कितना रुलाता है
तेरी यादों का वो मंजर मुझे कितना रूलाता है
तेरी यादों का वो मंजर, मुझे कितना रुलाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
क्या मालूम था कि गर्दिश का सितारा ऐसे टूटेगा,
जीवन के सफ़र में एक दिन, तेरा साथ छूटेगा।
तेरे बिन ऐ मेरे हमदम, नहीं दिल चैन पाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
तेरे होने की गर मुझको, कहीं कोई आस मिल जाए,
तमन्ना है मेरी इतनी, मुझे तू काश मिल जाए।
गुज़ारा साथ जो लम्हा, वही नश्तर चुभाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
बिखरती आस उल्फ़त की, यही फ़रियाद करती है,
चले आओ, चले आओ, निगाहें याद करती हैं।
रूपगिर का दुखी नग़मा, तुम्हें हरदम बुलाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
तू जब-जब याद आता है।।
क्या मालूम था कि गर्दिश का सितारा ऐसे टूटेगा,
जीवन के सफ़र में एक दिन, तेरा साथ छूटेगा।
तेरे बिन ऐ मेरे हमदम, नहीं दिल चैन पाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
तेरे होने की गर मुझको, कहीं कोई आस मिल जाए,
तमन्ना है मेरी इतनी, मुझे तू काश मिल जाए।
गुज़ारा साथ जो लम्हा, वही नश्तर चुभाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
बिखरती आस उल्फ़त की, यही फ़रियाद करती है,
चले आओ, चले आओ, निगाहें याद करती हैं।
रूपगिर का दुखी नग़मा, तुम्हें हरदम बुलाता है,
तू जब-जब याद आता है।।
तेरी यादो का वो मंजर मुझे कितना रुलाता है रुपगिरी वेदाचार्य जी भरतपुर
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वियोग और स्मृति का सम्मिलन हृदय को एक ऐसी गहराई में ले जाता है जहाँ शब्द अक्सर मौन हो जाते हैं और केवल आंसुओं की भाषा रह जाती है। जब कोई अपना साथ छूट जाता है तो जीवन का हर क्षण अधूरा लगने लगता है। स्मृतियाँ कभी संबल देती हैं, तो कभी नश्तर बन दिल को चीर जाती हैं। वे लम्हे जो कभी आनंद और अपनत्व से भरे थे, अब विरह की वेदना में बदलकर हर पल बेचैनी का कारण बन जाते हैं। मन बार-बार उसी प्रिय की झलक ढूंढता है, मानो उसके बिना संसार का स्वरूप ही फीका और सुनसान हो गया हो।
यादों का यह आह्वान केवल दर्द ही नहीं देता, बल्कि भीतर छिपी हुई गहराइयों को भी उजागर करता है। आँखें जब-जब उसे पुकारती हैं, तो आत्मा की पुकार भी उसी प्रियतम की ओर उठती है। यह भाव कभी हार मानता नहीं, बल्कि बार-बार मिलन की आकांक्षा जगाता है। उसी स्मरण में एक तरफ तड़प का दर्द है, तो दूसरी तरफ एक गहन प्रेम का आलोक भी है। इसी मिलन और बिछोह की यात्रा में मन समर्पण करना सीखता है, और प्रिय की अनुपस्थिति में भी उसकी उपस्थिति ढूंढकर जीवित रहने की तृष्णा को थामे रहता है।
यह भजन भी देखिये
संत मिलन को जाइये
मांगोगे वही मिलेगा मेरे सतगुरु के दरबार
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यादों का यह आह्वान केवल दर्द ही नहीं देता, बल्कि भीतर छिपी हुई गहराइयों को भी उजागर करता है। आँखें जब-जब उसे पुकारती हैं, तो आत्मा की पुकार भी उसी प्रियतम की ओर उठती है। यह भाव कभी हार मानता नहीं, बल्कि बार-बार मिलन की आकांक्षा जगाता है। उसी स्मरण में एक तरफ तड़प का दर्द है, तो दूसरी तरफ एक गहन प्रेम का आलोक भी है। इसी मिलन और बिछोह की यात्रा में मन समर्पण करना सीखता है, और प्रिय की अनुपस्थिति में भी उसकी उपस्थिति ढूंढकर जीवित रहने की तृष्णा को थामे रहता है।
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Admin - Saroj Jangir
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