निज स्वारथ के कारनै सेव करै संसार मीनिंग
निज स्वारथ के कारनै सेव करै संसार मीनिंग
निज स्वारथ के कारनै, सेव करै संसारबिन स्वारथ भक्ति करै, सो भावै करतार
Nij Swarath Ke Karane Sev Kare Sansar,
Bin Swarath Bhakti Kare, So Bhave Kartar.
कबीर के दोहे का हिंदी मीनिंग (अर्थ/भावार्थ)
इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि संसार में सभी लोग स्वार्थ से प्रेरित होकर दूसरों की सेवा करते हैं। उनके सेवा भाव में स्वार्थ छिपा रहता है. वे केवल अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की मदद करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उन्हें कुछ न कुछ लाभ मिलेगा। जो व्यक्ति बिना किसी भी स्वार्थ के लोगों की सेवा करता है वह इश्वर को प्रिय होता है, हरी को भाता है. कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सेवा करता है, वही वास्तव में भक्त होता है। वह दूसरों की भलाई के लिए काम करता है और परमात्मा को प्रसन्न करता है।
प्रथम व्याख्या: इस दोहे में "निज स्वारथ" से तात्पर्य उन सभी चीजों से है जिनका उपयोग व्यक्ति अपने लाभ के लिए करता है। जैसे कि धन, शक्ति, प्रसिद्धि, आदि। दूसरी व्याख्या: इस दोहे में "सेव" से तात्पर्य उन सभी कार्यों से है जिनसे दूसरों को लाभ होता है, यही स्वार्थ है। जैसे कि दान, सेवा, आदि। इस दोहे में "भक्ति" से तात्पर्य उस प्रेम और समर्पण से है जो हम ईश्वर के प्रति करते हैं।
अंततः, इस दोहे का संदेश यह है कि हमें दूसरों की सेवा स्वार्थ से बचकर करनी चाहिए। ऐसा करने से हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं और परमात्मा को प्रसन्न कर सकते हैं।
आज भी लोग दूसरों की सेवा केवल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। वे दूसरों की मदद करने के लिए आगे आते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल अपना नाम और प्रसिद्धि बढ़ाना होता है। ऐसे लोग भगवान की भक्ति में भी स्वार्थ रखते हैं। वे भगवान से धन, शक्ति, या प्रसिद्धि की प्राप्ति की कामना करते हैं। वास्तव में, भगवान को तो वही भक्त भाते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के उनकी भक्ति करते हैं। वे दूसरों की भलाई के लिए काम करते हैं और परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।
प्रथम व्याख्या: इस दोहे में "निज स्वारथ" से तात्पर्य उन सभी चीजों से है जिनका उपयोग व्यक्ति अपने लाभ के लिए करता है। जैसे कि धन, शक्ति, प्रसिद्धि, आदि। दूसरी व्याख्या: इस दोहे में "सेव" से तात्पर्य उन सभी कार्यों से है जिनसे दूसरों को लाभ होता है, यही स्वार्थ है। जैसे कि दान, सेवा, आदि। इस दोहे में "भक्ति" से तात्पर्य उस प्रेम और समर्पण से है जो हम ईश्वर के प्रति करते हैं।
अंततः, इस दोहे का संदेश यह है कि हमें दूसरों की सेवा स्वार्थ से बचकर करनी चाहिए। ऐसा करने से हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं और परमात्मा को प्रसन्न कर सकते हैं।
आज भी लोग दूसरों की सेवा केवल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। वे दूसरों की मदद करने के लिए आगे आते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल अपना नाम और प्रसिद्धि बढ़ाना होता है। ऐसे लोग भगवान की भक्ति में भी स्वार्थ रखते हैं। वे भगवान से धन, शक्ति, या प्रसिद्धि की प्राप्ति की कामना करते हैं। वास्तव में, भगवान को तो वही भक्त भाते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के उनकी भक्ति करते हैं। वे दूसरों की भलाई के लिए काम करते हैं और परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।
अतः इस दोहे का सन्देश है की लोगों की भलाई और सेवा का कार्य बिना किसी स्वार्थ के करनी चाहिए, यदि हम स्वंय के किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए सेवा भाव करते हैं तो वह व्यर्थ है क्योंकि इश्वर भी उसी को पसंद करते हैं जो बिना किसी निज स्वार्थ के लोगों से प्रेम करता है और मानवीय गुणों को धारण करता है.
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Author - Saroj Jangir
दैनिक रोचक विषयों पर में 20 वर्षों के अनुभव के साथ, मैं कबीर के दोहों को अर्थ सहित, कबीर भजन, आदि को सांझा करती हूँ, मेरे इस ब्लॉग पर। मेरे लेखों का उद्देश्य सामान्य जानकारियों को पाठकों तक पहुंचाना है। मैंने अपने करियर में कई विषयों पर गहन शोध और लेखन किया है, जिनमें जीवन शैली और सकारात्मक सोच के साथ वास्तु भी शामिल है....अधिक पढ़ें। |
