मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में

मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में


मनमोहन, तुम रूठ गए तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?
साथ रहे हो, अब न रहा तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?

ज़िंदगी का कारवाँ,
रुकता नहीं है,
दिल है, श्याम! तुम बिन,
धड़कता नहीं है,
चलने से पहले मैं गिर गया तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?

तुम्हें क्या नहीं ख़बर?
सब कुछ पता है,
दिल ये, दर्द मेरा,
हद से गुज़रता है,
मिलने से पहले बिछड़ गया तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?

ग़म के मेले में कैसे,
मुलाक़ातें हों?
मेरे इश्क़ की,
आख़िरी साँसें हों,
जीने से पहले मन मर गया तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?

मिलने का रोग जो,
तुझसे लगा है,
छलिया ना तू छलो,
ये दास तेरा है,
दर्शन से पहले भटक गया तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?

मनमोहन, तुम रूठ गए तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?
साथ रहे हो, अब न रहा तो,
कौन मेरा जग में?
कान्हा! कौन मेरा जग में?


मनमोहन तुम रूठ गए | Manmohan Tum Rooth Gaye | Beautiful Krishna Bhajan by Balvyas Vivek Ji Maharaj

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Saroj Jangir Author Author - Saroj Jangir

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