कबीर की साखी सरल हिंदी अर्थ सहित जानिये
ऐसा रे अवधू की वाणी, ऊपरि कूवटा तलि भरि पाँणीं॥टेक॥
जब लग गगन जोति नहीं पलटै, अबिनासा सुँ चित नहीं विहुटै।
जब लग भँवर गुफा नहीं जानैं, तौ मेरा मन कैसै मानैं॥
जब लग त्रिकुटी संधि न जानैं, ससिहर कै घरि सूर न आनैं।
जब लग नाभि कवल नहीं सोधै, तौ हीरै हीरा कैसै बेधैं॥
सोलह कला संपूरण छाजा, अनहद कै घरि बाजैं बाजा॥
सुषमन कै घरि भया अनंदा, उलटि कबल भेटे गोब्यंदा।
मन पवन जब पर्या भया, क्यूँ नाले राँपी रस मइया।
कहै कबीर घटि लेहु बिचारी, औघट घाट सींचि ले क्यारी॥
जब लग गगन जोति नहीं पलटै, अबिनासा सुँ चित नहीं विहुटै।
जब लग भँवर गुफा नहीं जानैं, तौ मेरा मन कैसै मानैं॥
जब लग त्रिकुटी संधि न जानैं, ससिहर कै घरि सूर न आनैं।
जब लग नाभि कवल नहीं सोधै, तौ हीरै हीरा कैसै बेधैं॥
सोलह कला संपूरण छाजा, अनहद कै घरि बाजैं बाजा॥
सुषमन कै घरि भया अनंदा, उलटि कबल भेटे गोब्यंदा।
मन पवन जब पर्या भया, क्यूँ नाले राँपी रस मइया।
कहै कबीर घटि लेहु बिचारी, औघट घाट सींचि ले क्यारी॥
अर्थ : कबीरदास जी के इस पद में आत्मज्ञान की गूढ़ता को सरल भाषा में समझाया गया है। वे अवधूत (साधु) से कहते हैं कि उनकी वाणी ऊपर से तो कूप (कुएं) जैसी संकीर्ण प्रतीत होती है, लेकिन भीतर जल से परिपूर्ण है, अर्थात् बाहरी रूप से साधारण दिखने वाली वाणी भीतर गहन ज्ञान से भरी होती है।
जब तक मनुष्य आकाशीय ज्योति (आत्मा की प्रकाश) को नहीं देखता और अविनाशी परमात्मा में चित्त नहीं लगाता, तब तक उसका मन स्थिर नहीं हो सकता। जब तक वह भंवर गुफा (आध्यात्मिक केंद्र) को नहीं पहचानता, तब तक मन को कैसे समझा सकता है? त्रिकुटी संधि (तीन नाड़ियों का संगम) को जाने बिना, चंद्रमा के स्थान पर सूर्य को लाए बिना, और नाभि कमल (नाभि चक्र) का ज्ञान प्राप्त किए बिना, आत्मज्ञान की गहराई को समझना कठिन है।
सोलह कलाओं से पूर्ण चंद्रमा के समान, अनहद नाद (दिव्य ध्वनि) के घर में संगीत बजता है। सुषुम्ना (मध्य नाड़ी) में आनंद की अनुभूति होती है, जहां उलटकर (आत्मचिंतन द्वारा) गोविंद (परमात्मा) से मिलन होता है। जब मन और प्राण (पवन) एक हो जाते हैं, तब रस (आनंद) की धारा प्रवाहित होती है। कबीर कहते हैं कि इस गूढ़ ज्ञान को समझो और कठिन मार्ग (आध्यात्मिक साधना) की क्यारी (भूमि) को सींचो, जिससे आत्मज्ञान का पुष्प खिल सके।
शब्दार्थ:
जब तक मनुष्य आकाशीय ज्योति (आत्मा की प्रकाश) को नहीं देखता और अविनाशी परमात्मा में चित्त नहीं लगाता, तब तक उसका मन स्थिर नहीं हो सकता। जब तक वह भंवर गुफा (आध्यात्मिक केंद्र) को नहीं पहचानता, तब तक मन को कैसे समझा सकता है? त्रिकुटी संधि (तीन नाड़ियों का संगम) को जाने बिना, चंद्रमा के स्थान पर सूर्य को लाए बिना, और नाभि कमल (नाभि चक्र) का ज्ञान प्राप्त किए बिना, आत्मज्ञान की गहराई को समझना कठिन है।
सोलह कलाओं से पूर्ण चंद्रमा के समान, अनहद नाद (दिव्य ध्वनि) के घर में संगीत बजता है। सुषुम्ना (मध्य नाड़ी) में आनंद की अनुभूति होती है, जहां उलटकर (आत्मचिंतन द्वारा) गोविंद (परमात्मा) से मिलन होता है। जब मन और प्राण (पवन) एक हो जाते हैं, तब रस (आनंद) की धारा प्रवाहित होती है। कबीर कहते हैं कि इस गूढ़ ज्ञान को समझो और कठिन मार्ग (आध्यात्मिक साधना) की क्यारी (भूमि) को सींचो, जिससे आत्मज्ञान का पुष्प खिल सके।
शब्दार्थ:
- अवधू: साधु, संत
- वाणी: शब्द, कथन
- कूवटा: कुआं
- गगन: आकाश
- जोति: प्रकाश
- अबिनासा: अविनाशी, नाश रहित
- भँवर गुफा: आध्यात्मिक केंद्र, ध्यान का स्थान
- त्रिकुटी संधि: तीन नाड़ियों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना) का संगम
- ससिहर: चंद्रमा
- नाभि कवल: नाभि कमल, नाभि चक्र
- सोलह कला: पूर्णता के सोलह गुण
- अनहद: अनंत, बिना सीमा के
- सुषमन: सुषुम्ना नाड़ी
- गोब्यंदा: गोविंद, भगवान
- औघट घाट: कठिन मार्ग, दुर्गम स्थान
- क्यारी: क्यारी, भूमि
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