राजस्थानी शब्द और उनका अर्थ/मीनिंग हिंदी Rajasthani Word Meaning Hindi
प्रस्तुत लेख में राजस्थानी भाषा के शब्दों का संग्रह दिया गया है। इन राजस्थानी शब्दों के हिंदी अर्थ/मीनिंग को भी इस लेख में दिया गया है। राजस्थान में आंचलिक रूप से इन शब्दों को पृथक तरह से बोला जाता है लेकिन इन सभी का मुख्य अर्थ समान ही रहता है।
राजस्थानी शब्दावली भाग प्रथम Rajasthani Shabdawali Part -1
Rajasthani Word Meaning Hindi Rajasthani Dictionary in Hindi
अखड, पड़त, पडेत्या (Akhad) : ऐसा खेत जिसे अडावा छोड़ दिया गया है। अडावा से आशय खेत में जुताई नहीं करना और पशुओं के चारे के लिए घास को स्वतः ही उगने देना होता है। (अखड के विषय में अधिक जानें )
अड़क बीज (Adak Beej ) ऐसा बीज/फसल जो केवल पशु ही खा सकते हैं (अधिक जानें अडक बीज)
आंगी (Aangi) : स्त्री की चोली, अंगरखी को राजस्थानी में आंगी (कांचली ) कहा जाता है जिसे सूती कपडे से बनाया जाता था और गाँवों में बूढी / वृद्ध औरतें इसे पहनती थी। वर्तमान में इसका चलन कम हो गया है।
उस्तरा (Ustara) : वर्तमान में रेजर ब्लेड और शेविंग मशीन के स्थान पर उस्तरा कार्य में लिया जाता था जिसे पत्थर की बट्टी पर घिस कर धार लगाईं जाती थी जिससे शेविंग की जाती थी।
ओबरी (Obari) : अनाज आदि के संग्रह करने के लिए मिटटी से बनाया जाने वाला स्थान। ओबरी विशेष मिटटी (चिकनी मिटटी) से बनाई जाती थी।
ओबरो (Obaro/Obari) : अनाज, खाद्यान आदि को स्टोर करने के लिए बनाई गई जगह।
ओरणी (Orani) : ओरणी से आशय बिजाई के समय हल के साथ लगाईं जाने वाली नाली/थैली होता है जिसे नायलो कहते हैं जिसमे बीज रखे जाते हैं।
ओरा (Aura) : घर में बना हुआ कोने का कमरा ओरा कहलाता है।
कब्जो (Kabjo) : ग्रामीण महिलायें साड़ी के ऊपर ब्लाउज पहनती हैं जिसे कब्ज़ा कहते हैं, यह विशेष रूप से कॉटन कपडे से बना होता है, अतः ब्लाउज को ही कब्ज़ा/कब्जो कहते हैं।
कलेवो/कलेवा (Kalevo/Kaleva): सुबह का नाश्ता, ब्रेकफास्ट को राजस्थानी में कलेवा, कलेवो कहते हैं।
कांचली (Kanchali) : कांचली से आशय बुजुर्ग स्त्रियों के द्वारा पहने जाने वाला ब्लाउज होता है।
कांजर (Kanjar) : कांजर से आशय "कंजर" जाती से होता है जो मांग कर खाती हैं। स्लैंग के रूप में कांजर से आशय ऐसा व्यक्ति जो बहुत शोर मचाता हो, गंवार हो, झगड़ालू हो आदि होता है।
कांदों/काना (Kanda/Kando/kaana ) : प्याज को ही राजस्थानी में कानो/कांदो /कांदा आदि कहते हैं।
काका/काको (Kaka/Kako ) : चाचा, पिता का छोटा भाई को राजस्थानी में काको/काका कहते हैं।
कासंन (Kansan) : बर्तन को कांसन कहा जाता है।
किना (Kina) : पतंग।
किलकीटारि (Kilkitari) : गिलहरी
कुटी (Kutti) : गर्मियों में खेतों में उगाये जाने वाले बाजरे को सूखा कर उसे छोटे छोटे हिस्सों में काट कर जानवरों के लिए जो चारा बनाया जाता है उसे कुट्टी कहते हैं।
कुत्तर (Kuttar) : पशुओं का चारा।
कुदाली, कुश (Kudali/Kush) : मिट्टी को खोदने का फ़ावडेनुमा औजार।
कुलियों, कुलड़ी/(Kuliyo) : मिट्टी का छोटा घड़ेनुमा बर्तन कुलड़ी, कुलियों कहलाता है।
कोटड़ी (Kotadi) : छोटे आकार का कमरा।
खटुलो (Khutalo) : छोटी खाट जिसपर बच्चों को सुलाया जाता है।
खाखला / खाखलो (Khakhala) : पशुओं का चारा।
खाट (Khaat) : चारपाई, बेड।
खुसड़ा (Khusada) : जूते चप्पल को राजस्थानी में खुसड़ा/खूंसङी/खूंसडो कहते हैं।
खूंटा/खूंटो (Khunta) : बोलाई में पशुओं को एक स्थान पर बाँधने के लिए लकड़ी का मोटा हिस्सा जिसे जमीन में गाड़ कर उससे पशुओं को बाँधा जाता है।
खूंटी (Khunti) : घर में कपडे, थैले आदि को लटकाने के लिए लकड़ी से बनाया जाने वाला एक हेंगर जिस पर कपडे आदि को लटकाया जाता है। खूंटी को मकान की चुनाई के समय ही दीवार में स्थापित कर दिया जाता था।
खेळ/खेली (Khel) : पशुधन के लिए पानी के लिए बनाया जाने वाला उथला कुंड, छोटी कुण्डी खेळ कहलाती है। खेळ का पक्का निर्माण किया जाता है जो अक्सर आयताकार और गोल आकार की होती है।
ख्वासजी (Khavasji) : नाई को ग्रामीण भाषा में ख्वासजी कहते हैं।
गंजी (Ganji) : बनियान को देसी भाषा में गंजी कहते हैं।
गादड़ो (Gaadado) : सियार को गादड़ो और सियारी को गादडी कहा जाता है।
गिटना (Gitta) : अनाप शनाप खाने को निगलना। इसका उपयोग नकारात्मक भाव में किया जाता है।
गिलगावरी (Gilgavari) : गिलहरी।
गीगलो (Geegalo) : गीगा/गीगला/गीगलो से आशय छोटी उम्र का शिशु होता है जिसे सभी प्रेम करते हैं।
गुम्हारिया (Gumhariya) : तलघर, बेसमेंट।
गुलेल (Gulel) : पक्षियों को मार भगाने के लिए लकड़ी से बनाया जाने वाला यंत्र।
गूणी (Guni) : लाव की खींचने हेतु बैलो के चलने का ढालनुमा स्थान, यह कुए के पास से ऊपर और खींचने के स्थान से निचाई लिए हुए होता है।
गूणीया (Guniyo) : चाय/दूध/पानी रखने का छोटा बर्तन गुणिया कहलाता है।
गूदड़ा (Gudada): पुराने कपड़ों से बनाया जाने वाला गद्दा गुदड़ा / गुदडी कहलाता है।
गेलड़ (Gelad): पहली पत्नी को छोड़ देने / मृत्यु हो जाने पर पुरुष के द्वारा दूसरी शादी करने पर पहली स्त्री के बच्चे गेलड़ कहलाते हैं।
गोफन (Gofan) : चमड़े की डोरियों से बना हुआ एक यंत्र जिससे पत्थरों को फेंका जाता है।
घडूची (Ghaduchi): जिस स्थान पर पानी के मटके रखे जाते हैं।
परिंडा (Parinda ) रसोई के पास एक ऐसा स्थान जहाँ पर मिटटी के मटकों में पानी को रखा जाता है।
घनेड़ी (Ghanedi): भानजा/भांजी।
घुचरियो (Ghuchariyo) : कुत्ते के बच्चे घूचरया, घुचरयो, घुचरी (पिल्लै) कहलाते हैं।
चडस (Chadas) : पूर्व के समय में ऊंट / पाड़ा (भैंसा) के लाव बांधकर पानी निकाला जाता था।पानी निकालने के लिए चमड़े को मंढकर एक बड़ा पात्र बनाया जाता था जिसमें पानी को भर कर खींच कर बाहर निकाला जाता था। इसी पानी भरने के पात्र को चड़स कहा जाता था।
चरणोत (Charnot) : पशुओं के चरने की भूमि, चारागाह, अड़ावा।
चावर, पाटा, पटेला, हमाडो, पटवास () : जोतने के उपरान्त खेत को समतल करने हेतु लकड़ी का एक बड़ा भारी टुकड़ा जिसे हेरा भी कहा जाता है। इसे खेत में फिरा कर मिटटी की बड़े बड़े डग्गल को तोडा जाता था और खेत को समतल किया जाता था।
चू, चऊ (Chu/Chau) : हल के निचे की तरफ धातु/लकड़ी का तीखा भाग।
चूंण/चून (Choon) : आटा, गेहूं/बाजरे का आता।
चोबारा (Chobara) : घर की पहली मंजिल पर बना कमरा चौबारा/मालिया कहलाता है।
चौमासो (Chomaso) : बारिश का मौसम, चार महीनों का मौसम जिसमें बारिस होती है।
छाजलो (Chaajalo) : सरकंडों से बना हाथों में पकड़ने का छायला जिससे अनाज को फटक कर साफ़ किया जाता है।
छाणों/छानै (Chhana) : गाय/भैंस के गोबर को सूखा कर बनाये जाने वाले उपले, छाणे /छाणा कहलाते हैं।
छान (Chhaan) : सरकंडों और बाती से बनी हुई टप्पर, झौंपड़ी।
झूंपा (Jhunpa ) गोल आकर की झोपड़ी जिसे सरकंडों और बाती से बनाया जाता था, यह गर्मियों में बहुत ठंडी रहती है।
छायालो (Chhayalo) :अनाज को साफ़ करने के लिए सरकंडों से बना हुआ छायला /छाज।
छोरा (Chhora) : छोरा का हिंदी में अर्थ लड़का होता है, जैसे बृज में लाडा लड़के को कहते हैं वैसे ही राजस्थानी भाषा में लड़के को छोरा, छुर्रेट आदि कहा जाता है।
छोरी (Chhori): इस शब्द का उपयोग आम बोल चाल में किया जाता है जिसका अर्थ लड़की होता है। राजस्थान के अतिरिक्त छोरी शब्द का प्रयोग हरियाणवी भाषा में भी किया जाता है। स्वंय के अतिरिक्त किसी अन्य की लड़की को छोरी बोल दिया जाता है, यद्यपि छोरी बोलना सम्मान का भाव प्रदर्शित नहीं करता है. सम्मान देने के लिए राजस्थानी में "बाई" कहा जाता है।
जापो (Japa/Japo) : स्त्री का प्रसूति समय, बच्चा पैदा करना जापा कहलाता है।
जावण (Jawan) : दूध को दही जमाने के लिए दही की खटाई देने को जावण देना कहते हैं।
जावणी (Javani) : दूध को गर्म करने के उपरान्त दूध को जमाने/दही बनाने के लिए उपयोग में ली जाने वाली बड़ी मटकी, जावणी कहलाती है (जावणी का विस्तृत अर्थ देखें )
जिनावर/जयानबर (Jinavar): पशु, मूर्ख व्यक्ति।
जेळी (Jeli) : लकड़ी से बना हुआ एक कृषि का उपकरण जिससे चारे, झाडी, पूळा आदि को उनमे घुसा कर उठाया जाता है, जेळी कहलाती है। जेळी दो सिंगा, चौसिंगा आदि होती है।
झबलो (Jhabalo) : नवजात शिशु की पोशाक, झबला कहलाती है।
झरोखो (Jharokho) : छोटी खिड़की जिससे बाहर झाँका जाता है। स्माल विंडो।
झालरों (Jhalaro) : झालरों गले में पहने जाने वाली एक माला का नाम होता है।
झुतरा (Jhootara) : बाल, केश।
झेरना (Jherana) : छाछ/दही को मथने के लिए काम में आने वाली एक बड़ी रई झेरणा कहलाती है जिसे हाथों से नेतरा की सहायता से गोल गोल घुमाया जाता है। (झेरणा का विस्तृत अर्थ देखें )
झोंपड़ी (Jhoupadi) : सरकंडों और बाती से तैयार घर, इसे झूपड़ी, छान भी कहा जाता है।
टाबर (Tabar): टाबर/टाबरिया, टाबरां से आशय छोटे बच्चे, बच्चों का समूह आदि होता है। बच्चों को बहुवचन के रूप में टाबरिया कहा जाता है।
टोळडो (Toldo) : ऊँट का बच्चा (पु).
टोळडी (Toldi) ऊंट का मादा बच्चा।
थाठ्यो (Thanthyo) :रद्दी कागज़ की लुगदी बना कर उसे घड़े के ऊपर लेपकर तैयार बर्तन को ठाठयो कहा जाता है। यह आधे घड़े और पुरे घड़े के रूप में होता है। लुगदी के सूख जाने पर अन्दर के मिटटी के घड़े को तोड़ दिया जाता है जिससे कागज़ से तैयार पात्र शेष बच जाता है।
ठाण (Thaan) : पशुओं को चारा डालने का उपकरण जो लकड़ी या पत्थर से बनाया जाता है। यह आकार में अक्सर चौकोर होती है।
ठिकाणा (Thikana) : रहवास, रहने का स्थान घर का पता।
ठूंगा (Thunga) : कागज़ से तैयार थैली जिसमे कोई वस्तु डाली जाती है। प्रायः रेहड़ी वाले इसे रखते हैं।
डांगर (Dangar) : पशु, पशुधन को शेखावाटी/राजस्थानी में डांगर कहा जाता है। विशेष है की ऐसा व्यक्ति जो मुर्ख हो, आड़ू हो उसे भी स्लैंग के रूप में डांगर कहा जाता है.
डागला (Daagala) : छत, मकान के ऊपर का भाग डागला कहा जाता है।
ढींकळी (Dheenkali) : कुए से पाणी खींचने के काम आने वाला एक यंत्र जो कुए के ऊपर लगाया जाता है।
ढूँगरा, ढूँगरी (Dhungari) : चौमासे में फसल को काट कर एक स्थान पर इकठ्ठा करके उसका एक बड़ा ढेर लगा दिया जाता है जिसे ढूँगरा, ढूँगरी कहते हैं।
ढोर (Dhor) : पशुधन यथा गाय, भैंस भेड़ बकरी आदि को डांगर के अतिरिक्त ढोर भी कहा जाता है.
तंगड (Tangad) : ऊंट, बैल, भैसे से खेत जोतने के लिए रस्सी की पट्टियां।
ताकड़ी (Takhadi) :तराजू,तुला आदि।
तड़काउ (Tadkau) : भोर, सुबह, अर्ली मोर्निंग।
तांती (Tanti) : एक पवित्र धागा जो मन्त्र पढने के उपरान्त व्यक्ति के बाँह में बाँधा जाता है।
ताकङी (Takadi) : तराजू, तुला।
तागड़ी (Tagadi) : शिशु और स्त्रियों की कमर में बांधे जाने वाला धागा जो काले रंग का होता है।
तिस (Tis) : प्यास, पाणी की प्यास।
तीपड़ (Teepad): तीसरा माला, तीसरी मंजिल।
थली/थळी (Thali) : दहलीज, मुख्य दरवाजे के सामने का स्थान।
दंताली, दांतली (Dantali) : हाथ में पकड़ कर फसलों को काटने के काम में आने वाला एक कृषि ओज़ार।
दावणा (Davana) : पशुओं को इधर उधर भागने से रोकने के लिए उनके आगे के पांवों में एक रस्सी को बाँध दिया जाता है जिससे वे सिर्फ चल सकते हैं, दौड़ नहीं पाते हैं, दावन कहलाता है। दावना अक्सर पशुओं का दूध निकालने के दौरान भी लगाया जाता है।
दिशा जाना (Deesa Jana) : खेत में फ्रेश होने के लिए जाना, मलत्याग करने जाना।
नाँगला (Nangala) : नेडी और झेरने में डालने की रस्सी को नांगला कहते हैं।
नाडी (Nadi) : बरसात के पाणी को एकत्रित करने के लिए बनाया गया एक स्थान जहाँ पर पाणी को इकठ्ठा किया जाता है, तालाब बावड़ी आदि।
नातणौ (Nantanyo/Natanya) : रसोई में काम आने वाला एक कपड़ा जो पुराने कपड़ों को काट कर बनाया जाता है। यह गर्म दूध/चाय आदि के बर्तन को पकड़ कर निचे उतारने के काम आता है।
नीरनी (Neerani) : पशुओं का चारा जो मोठ और गवार के चारे से बनाया जाता है।
नीरो (Neero) : पशुओ का चारा, नीरा, नीरो कहलाता है।
नेडी (Nedi) : बिलोवना करने के लिए लकड़ी के एक बड़े स्तम्भ को जमीन में गाड दिया जाता है जिसके सहारे से झेरना चलाया जाता है।
नेतरा, नेता (Netara/Neta) :बिलोवना करने के लिए झेरना चलाने के लिए/घुमाने के लिए काम में ली जाने वाली एक रस्सी जो सूत की बनी होती है।
पतड़ो (Patado): पंचांग, तिथि निकालने की पुस्तक।
पथरना (Patharana): छोटा सोने के लिए पलंग।
पराणी (Parani) : पशुओं को हांकने की एक लकड़ी।
परिंडा (Parinda) : जलग्रह, रसोई के पास पानी के घड़े रखने का स्थान।
पसेरी/धडी (Paseri/Dhadi): तौल की एक इकाई जो 5 किलो की होती है।
पाणत (Panat) : फसलों में पानी लगाना।
पालर पाणी (Palar Pani) : बारिश/बरसात का पाणी जिसे पालरा पानी भी कहते हैं। इस पानी को भूमिगत टैंक में स्टोर किया जाता है।
पावड़ा (Pawada) : खुदाई के लिए बनाया गया उपकरण, जिससे मिटटी को खोदा जाता है। इसका उपयोग अक्सर ही गड्ढा खोदने, खाई बनाने के काम में होता है।
पावणा (Pawana) : मेहमान, जवाई।
पिडो/पिड्डो (Piddo) : पाटे या चौकी की भाँती बैठने के लिए बैठने के काम आने वाला, जो सूत या उन की रस्सियों से गूंथ कर बनाई जाती है।
पूँगा/मुशल (Punga) : षठ, मूर्ख, आड़ू, गंवार व्यक्ति को पूंगा कहते हैं।
पूरियों (Puriyo) : जानवरों के चारा खाने का स्थान।
फावड़ा (Phawada) : मिटटी खोदने के काम आने वाला औजार।
बटेऊ (Bateu) : मेहमान, जवाई।
बरिंडा (Barinda) : बरामदा, चौक। घर के कमरों के सामने का स्थान।
बाँझड (Banjhad) : अनुपजाऊ भूमि, बाँझ ओरत।
बांदरवाल (Bandarwal) : होली दिवाली या किसी अन्य मांगलिक कार्य के लिए घर के दरवाजों के ऊपर बाँधी जाने वाली लड़ी जिसमें कुछ पत्ते / फूल आदि गूंथ कर लगाए जाते हैं।
बाखल (Bakhal): बगीचा।
बाजोट (Bajot) : लकड़ी की एक बड़ी चौकी जो बैठने के काम आती है।
बिलाई (Bilaayi ) : बिल्ली को राजस्थानी में बिलाई कहते हैं।
बिलाव (Bilaav ) नर बिल्ली, बिल्ला को राजस्थानी में बिलाव कहते हैं।
बावणी (Baawani) : खेतों में बिजाई करने के स्थान को बावनी कहा जाता है।
बावनी (Bavani): बौनी स्त्री, कम लम्बाई की स्त्री।
बावनो/बावण्यो (Bawanyo/Bavano): बौना पुरुष।
खरलो (Kharalo ) : सरकंडों से चौकोर आकर का एक टब जैसा बर्तन बनाना जिसमें खेत में जाने के लिए रोटियां, छाछ आदि लेकर जाइ जाती है।
बिजूका (Bijuka ), अडवो, बिदकणा : खेतों में मानव जैसी आकृति बना कर ऊँचे स्थान पर लगाया जाने वाला एक पुतला जिससे आवारा पशुओं को खेत से दूर रखा जाता है।
बिलौवनी (Bilovani) : एक बड़ा मिटटी का मटका जिसमें दही को मथा जाता है और मक्खन और छाछ को अलग किया जाता है।
बींद/बीन (Been/Beend): राजस्थानी भाषा में दूल्हा को बीन/बींद कहा जाता है।
बींदणी/बीनणी (Beendani/Beenani) दुल्हन, बहु को बींदणी/बीनणी कहा जाता है।
बीड (Beed) : गाँव के किनारों पर खाली पड़ी जमीन जो प्रायः सरकारी होती है जिसमें आवारा पशु चरते हैं बीड़ कहलाती है।
बीरा, वीरा (Beera ) : भाई, सगा भाई।
बेगा बेगा (Bega Bega): जल्दी जल्दी, बेगा का अर्थ जल्दी/शीघ्र होता है।
बेड़ियो (Bediyo): रसोई में मसालों को रखने की मसालेदानी। यह प्रायः लकड़ी की बनी होती जिसमें छोटे छोटे खाने होते हैं जिनमें मिर्च, हल्दी, नमक धनिया आदि मसालों को रखा जाता है।
बेवणी (Bewani) : चूल्हे (लकड़ियों को जला कर कर काम में लेने वाला ) के सामने एक चौकोर स्थान जहाँ पर चूल्हे की राख को इकठ्ठा किया जाता है।
बानी (Baani) : बानी से आशय राख से है। चूल्हे से, कुरिया से जो राख निकलती है उसे बानी कहा जाता है।
बेसवार (Beswar): विभिन्न मसालों का संयोग, बेसवार कहा जाता है, यथा कैरी के अचार का बेसवार।
भंवर (Bhanwar) : बड़ा लड़का, भंवर सामान्य रूप में परिवार के सबसे बड़े (उम्र) को कहा जाता है।
भंवरी (Bhanwari) : बड़ी लड़की, उम्र में सबसे बड़ी लड़की।
भरतार (Bhartaar): पती
भावज (Bhaavaj ) : भाभी, भाई की बहन, इसे हिंदी में भोजाई भी कहते हैं।
भिलड (Bhilad) : घोडा मक्खी, आकार में बड़ी मधुमक्खी, जिसे माताजी की मक्खी भी कहा जाता है।
भूड़ोजी (Bhudoji): फूफा।
मटकी (Mataki) : मिटटी से बना एक पात्र जो मटके से छोटा होता है और यह पानी, छाछ, दही आदि को रखने के काम में ली जाती है।
मण (Man): तौल की एक इकाई जो 40 kg की होती है।
मांडी (Mandi) : वस्त्रों को दिया जाने वाला कलफ।
मांढणो (Mandhno) : चित्र बनाना, आकृति बनाना, लिखना।
माचो (Macho) खाट, चारपाई।
मायरो (Mayaro) : भाई के द्वारा पहन की संतान के लिए भरा जाने वाला भात।
मालिया (Maliya) : घर की छत का सबसे ऊपर का कमरा मालिया/चौबारा कहलाता है।
मीती (Meeti): तीथी, यथा मांगलिक तिथि।
मुकलाओ (Muklava/Muklao) : पूर्व में शादी से पहले गौना किया जाता था और लड़की के वयस्क होने पर ससुराल लाया जाता है। प्रथम बार जब शादीशुदा लड़की को घर पर /ससुराल लाया जाता था उसे "मुकलावा" "मुकलाओ" कहते थे। (मुकलावा का विस्तृत अर्थ देखें )
मुदो (Mudo) : शादी में वर के किया जाने वाला तिलक मुदा/मुदो कहलाता है।
मुहमांखी/मदमाखी (Momakhi/Mumakhi) : मधु मक्खी, इसे मोमाखी भी कहा जाता है।
मूण (Moon) : मिटटी से निर्मित एक बड़े घड़े को मून/मूण कहा जाता है।
मेर (Med/Mer) : जाते गए खेत में चारों तरफ छोड़ी गई खाली जमीन।
मेल/मेळ (Mel) : शादी/विवाह के अवसर पर आयोजित प्रीतिभोज "मेल" कहलाता है जो मिलाप से बना है।
मोडा/मोडो/मोड्या (Modo) : साधुओं को व्यंग्यात्मक रूप से ग्रामीण भाषा में मोडा कहा जाता है।
मोड़ो/मोङ(अ) (Modo) मोड़ो का अर्थ देरी होता है। मोड़(अ)आयो से आशय देरी से आना, मन्ने मोड़ो हुवे है /मुझे देरी हो रही है।
रमण (Raman) : रमण से आशय खेल, क्रीड़ा से है।
रहँट/रहट (Rahat) : सिंचाई के लिए कुओं से पानी निकालने का यंत्र, रहट कहलाता है।
राखूंडो (Rakhundo) : ग्रामीण इलाकों में पूर्व में राख से बर्तनों को साफ़ किया जाता था। बर्तन साफ़ करने के इस निश्चित स्थान को राखुंडों कहा जाता था।
रेलनी (Relani) : गर्मिंयों में गर्मी को कम करने के लिए खेतों में पानी लगाना।
लाडलो (Ladalo) : लाडला की भाँती ही लाडलो से आशय माता पिता का प्रिय लड़का होता है।
लाडी (Laadi): लाडला/लाड़ली।
लाडो (Laado) : माता पिता की लाडली लड़की को लाडो कहा जाता है, लाडो से आशय लड़की से है।
लालजी (Laalji) पति के छोटे भाई को प्यार से "लाल जी" कहा जाता है।
लाव (Laav) : कुएँ में जाने तथा कुएँ से पानी को बाहर निकालने के लिए डोरी को लाव कहा जाता है
लावणी (Lawani) : फसलों की कटाई को लावणी कहा जाता है।
निनाण (Ninan ) फसलों के उगने के उपरान्त उनके साथ उग आई खरपतवार को उखाड़ना, निराई करना निनाण कहलाता है।
लुगाई (Lugayi/Lugai): पत्नी/स्त्री।
लूकटी (Lookati) : लोमड़ी, इसे लूंकड़ी भी कहा जाता है।
लूण (Loon/Lun) : नमक
लूण्यो (Lunyo) : कच्चा घी/मक्खन को लूणया घी कहते हैं।
वाकल पाणी (Vakal Paani) : पल का पीने योग्य पानी वाकल पानी कहलाता है।
शाल/शाळ (Shaal): घर के सामने की तरफ का बड़ा कमरा शाळ कहलाता है।
सड़ो, हडो, बाड़ (Sado) : खेत में फसलों की सुरक्षा के लिए कंटीली झाड़ियों से मेड को बाड़ कहते हैं।
सांकली (Sankali) : सरकंडा को सांकळी कहते हैं। यह सूखने के बाद काफी सख्त हो जाती है जिससे छायला, खरलो, झुंपा आदि बनाये जाते हैं।
सियाळो (Siyalo) : सर्दी/सर्दियों के तीन महीने।
सिरख (Sirakh): रजाई को सिरख कहते हैं।
सींकळौ (Seenkalo) : झेरणा को पकड़ने के लिए लोहे के गोल कुंडे जिनमें झेरणा घूमता है।
सुतली (Sutali) : सूट की बनी हुई रस्सी।
सूड (Sood) : खेत की जुताई से पूर्व खेत से झाड़ झंखाड़, खरपतवार आदि को हटाना।
सेर (Ser): तौल की एक इकाई जो 1 किलो की होती है।
हटडी (Hatadi) : मसालों को स्टोर करने का स्थान।
हरजस/हरिजस (Harjas): ईश्वर की भक्ति, भजन भाव।
होद (Hod) : पक्का भूमिगत पानी को स्टोर करने की टंकी।
ठान/ठाण (Thaan) : पशुओं को चारा डालने के लिए लकड़ी से बनाया जाने वाला पात्र ठाण कहलाता है।
तिबारी (Tibari) : बैठक कक्ष, घर के सामने, पोळ के पास स्थापित प्रमुख कमरा, बैठक कक्ष।
केटणो (Ketado) : मूसल को मारवाड़ी में केटणो कहा जाता है।
भखारी (Bhakhari) : घर के राशन, खाद्यान्न आदि को रखने का एक छोटा कमरा, अक्सर यह कमरा अंडरग्राउंड भी बनाया जाता है।
पिलाण (Pilaan) : ऊंट की पीठ पर एक लकड़ी का ढांचा बाँधा जाता है जिस पर सवारी, ऊंट चालाक बैठता है।
कुरियों (Kuriyo) : ऊंटनी का नवजात बच्चा, ऊंटनी का छोटा बच्चा।
टोरडियों (Toradiyo) : ऊंटनी का तरुण बच्चा, ऊंटनी का छोटा बच्चा।
डाग (Daag ) : ऊंटनी।
सांडणी : बड़ी ऊंटनी
सिरावण/ झारो/कलेवो (Siraavan ) सुबह का नाश्ता।
ओसाण (Osaan ) : व्यस्तता, समय नहीं मिलना। यथा ओसाण नहीं है से आशय है की समय नहीं है, बीजी है।
अवळाई (Avalaayi ) : घूम कर जाना, सीधे राह को छोड़ देना।
पगरखी (Pagrakhi ) : पैरो में पहने जाने वाली / जुतियां / चप्पल
सिरावण (Siravan ) : सुबह का नाश्ता, कलेवा।
लिगतर (Ligatar ) : जहरीले जीव जंतु यथा सांप, बिच्छु।
ढोला (Dhola ) ढोला (इंटों को गोलाई देकर छत का कमरा/मकान और प्रिय व्यक्ति, साजन यथा ढोला मारू। ढोला का एक अर्थ पति भी होता है।
घरठ/घठ (Ghath ) : चूना पत्थर से सीमेंट जैसा चिनाई का गारा तैयार करने के लिए घठ का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें बड़े पत्थर के गोल तुकडे को घुमा कर उसके दबाव से गारा/चिनाई का लेप् तैयार किया जाता है।